ममता की सुप्रीम कोर्ट में पैरवी पर सीजेआई की टिप्पणी
कोलकाता। एसआईआर को लेकर जारी कानूनी और सियासी रार के बीच सोमवार को सुप्रीम कोर्ट से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए बड़ी राहत भरी खबर सामने आई। मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने मुख्यमंत्री की व्यक्तिगत मौजूदगी और उनके द्वारा स्वयं अदालत में पैरवी किए जाने पर आपत्ति जताने वाले संगठन अखिल भारत हिंदू महासभा को जमकर फटकार लगाई। मुख्य न्यायाधीश ने तीखे लहजे में कहा कि किसी मुख्यमंत्री का स्वयं अदालत आकर अपनी बात रखना संविधान और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर अटूट विश्वास का प्रतीक है, अत: इस मामले को अनावश्यक रूप से राजनीति का विषय न बनाया जाए।
अदालत की इस टिप्पणी ने उन तमाम कयासों और आरोपों पर विराम लगा दिया, जिनमें भाजपा समर्थित संगठनों द्वारा मुख्यमंत्री की इस पहल को राजनीतिक नाटक करार दिया जा रहा था। मामले की गंभीरता को देखते हुए शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि पिछले सप्ताह जब ममता बनर्जी स्वयं याचिकाकर्ता के रूप में बहस करने पहुँची थीं, तो उन्होंने संवैधानिक मर्यादाओं के भीतर रहकर ही अपनी दलीलें पेश की थीं। सीजेआई ने इस बात को भी रेखांकित किया कि उन्होंने न केवल मुख्यमंत्री की बात सुनी, बल्कि उन्हें निर्धारित समय से अधिक बोलने का अवसर भी प्रदान किया।
अदालत ने मुख्यमंत्री द्वारा उठाई गई उन चिंताओं पर भी मुहर लगाई, जिनमें कहा गया था कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और स्थानीय बोलियों की भिन्नता के कारण डेटा में विसंगतियां पैदा हो रही हैं और लाखों वास्तविक मतदाताओं के नाम कटने का खतरा मंडरा रहा है। मुख्य न्यायाधीश ने इसके समाधान के लिए तकनीकी और प्रशासनिक स्तर पर सुधार के संकेत दिए हैं। वोटर लिस्ट के पुनरीक्षण की प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को बेहद महत्वपूर्ण और निर्णायक निर्देश जारी किए। अदालत ने साफ कर दिया कि मतदाता सूची से नाम हटाने या जोडऩे का अंतिम और सर्वोच्च अधिकार केवल इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ईआरओ) के पास ही सुरक्षित रहेगा। चुनाव आयोग द्वारा नियुक्त माइक्रो ऑब्जर्वर और रोल ऑब्जर्वर केवल सहायक की भूमिका में रहेंगे, वे सीधे तौर पर कोई भी नाम हटाने का निर्णय नहीं ले पाएंगे।
इसके अलावा, अदालत ने राज्य सरकार द्वारा नियुक्त अधिकारियों को दो दिवसीय विशेष प्रशिक्षण देने की अनुमति भी दे दी है, जो सत्यापन कार्य में मदद करेंगे। यह आदेश ममता बनर्जी की उन चिंताओं के अनुरूप माना जा रहा है जिसमें उन्होंने बाहरी राज्यों से आए अधिकारियों को निर्णायक शक्ति दिए जाने का विरोध किया था। गौरतलब है कि सोमवार की सुनवाई के दौरान मुख्यमंत्री व्यक्तिगत रूप से उपस्थित नहीं थीं, लेकिन उनकी दलीलों का प्रभाव पूरी कार्यवाही के दौरान स्पष्ट रूप से दिखाई दिया।
अदालत ने निर्वाचन आयोग को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि वह ईआरओ और एईआरओ की नियुक्ति और बदलाव में आवश्यकतानुसार निर्णय ले सकता है, लेकिन पूरी प्रक्रिया पारदर्शी और निष्पक्ष होनी चाहिए। इस अदालती आदेश को तृणमूल के लिए एक बड़ी नैतिक जीत के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि अब मतदाता सूची के सत्यापन में स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका और उनकी निर्णायक शक्ति सुनिश्चित हो गई है।