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लिलुआ डि-एडिक्शन सेंटर में युवक की पीट-पीटकर हत्या, रक्षक ही बने भक्षक
कोलकाता। लिलुआ इलाके से रूह कंपा देने वाली एक ऐसी वारदात सामने आई है, जिसने नशामुक्ति केंद्रों के दावों और उनकी कार्यप्रणाली पर गहरा कलंक लगा दिया है। एक युवक, जिसे उसके परिवार ने नई जिंदगी की उम्मीद में डि-एडिक्शन सेंटर (नशामुक्ति केंद्र) की चौखट पर सौंपा था, उसकी वहीं के कर्मचारियों ने कथित तौर पर बेरहमी से पीट-पीटकर जान ले ली। नशे की लत छुड़ाने के नाम पर दी गई इस तालिबानी सजा ने न केवल एक मां की गोद सूनी कर दी, बल्कि पूरे इलाके में भारी आक्रोश और सनसनी फैला दी है। घटना की जानकारी मिलते ही परिजनों का सब्र टूट गया और उन्होंने केंद्र के बाहर जमकर हंगामा किया।
परिजनों का आरोप है कि केंद्र के भीतर उनके लाडले के साथ अमानवीय व्यवहार किया गया और मामूली बात पर उसे इतना पीटा गया कि उसने दम तोड़ दिया। युवक को एक बेहतर भविष्य की आस में इस केंद्र में भर्ती कराया गया था, लेकिन वहां मौजूद कर्मचारी जल्लाद बन बैठे। जैसे ही युवक की मौत की खबर फैली, स्थानीय निवासियों और परिवार के सदस्यों ने नशामुक्ति केंद्र को घेर लिया और वहां काम करने वाले लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग को लेकर प्रदर्शन शुरू कर दिया। लोगों का गुस्सा इस बात को लेकर भी था कि नशामुक्ति के नाम पर चल रहे इन टॉर्चर सेंटरों की सुध लेने वाला कोई नहीं है। मामले की गंभीरता को देखते हुए लिलुआ पुलिस ने तुरंत मोर्चा संभाला और केंद्र पर छापेमारी कर कई कर्मचारियों को हिरासत में ले लिया है। पुलिस की प्राथमिक जांच में मारपीट के गंभीर निशान मिलने की बात सामने आ रही है, जिसे देखते हुए हत्या का मामला दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है, जिसकी रिपोर्ट आने के बाद मौत की असल वजह और चोटों की भयावहता का आधिकारिक खुलासा हो सकेगा। फिलहाल हिरासत में लिए गए कर्मचारियों से कड़ी पूछताछ की जा रही है ताकि इस खूनी खेल के पीछे की पूरी सच्चाई सामने आ सके। इस लोमहर्षक घटना ने हावड़ा और आसपास के इलाकों में चल रहे नशामुक्ति केंद्रों की वैधता और उनकी निगरानी पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। पुलिस अब इस बात की भी गहन जांच कर रही है कि क्या इस सेंटर के पास संचालन के लिए आवश्यक सरकारी लाइसेंस और चिकित्सा सुविधाएं मौजूद थीं।
स्थानीय लोगों का दावा है कि कई ऐसे केंद्र बिना किसी रोक-टोक के चल रहे हैं जहां मरीजों को सुधारने के बजाय उनके साथ जानवरों जैसा सलूक किया जाता है। अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस जघन्य कांड के दोषियों को कितनी जल्दी सलाखों के पीछे भेजता है और अवैध रूप से चल रहे ऐसे केंद्रों पर क्या नकेल कसी जाती है।