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सीएए पर मतुआ समुदाय में कन्फ्यूजन, दीदी के खेल में फंसी बीजेपी

उन्होंने बताया कि मतुआ समुदाय की इस दिक्कत के बारे में सरकार और पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को बताया गया है

16 May 2024

सीएए पर मतुआ समुदाय में कन्फ्यूजन, दीदी के खेल में फंसी बीजेपी

कोलकाता। बंगाल के चुनाव में नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) पर रार छिड़ी है। अमित शाह समेत बीजेपी के सभी नेता खुले तौर पर सीएए को लागू करने वादा कर रहे हैं, मगर टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी इसे साजिश बता रही हैं। पश्चिम बंगाल में सीएए का फायदा उन लोगों को मिलेगा, जो 70 के दशक में बांग्लादेश से जान बचाकर भारत में शरण ली थी। इसमें बंगाल का मतुआ समुदाय भी शामिल है, मगर राजनीतिक बयानबाजी के बाद मतुआ समुदाय भ्रमित है। 
समुदाय के लोग सीएए के तहत नागरिकता आवेदन करने से हिचक रहे हैं। अमित शाह इसकी खूबियां गिना रहे हैं और ममता बनर्जी खामियां बता रही हैं। नागरिकता को लेकर कन्फ्यूजन की स्थिति का असर बनगांव और राणाघाट समेत पांच लोकसभा सीटों पर पड़ सकता है। बंगाल के बनगांव लोकसभा क्षेत्र के 19 लाख वोटरों में से 70 फीसदी मतुआ समुदाय के हैं। इसके अलावा इस क्षेत्र के 27 फीसदी अल्पसंख्यक मतदाताओं में भी सीएए को लेकर असमंजस की स्थिति है।

लोकसभा चुनाव से पहले केंद्र सरकार ने नागरिकता संशोधन अधिनियम को अधिसूचित कर दिया था। 15 मई को सीएए के तहत 14 लोगों को मिला सिटीजनशिप सर्टिफिकेट भी दिया गया। इस कानून का फायदा भारत के पड़ोसी देशों पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए अल्पसंख्यकों पर मिलेगा, जो धार्मिक उत्पीडऩ या भय के कारण 31 दिसंबर 2014 से पहले भारत आए थे। संसद में बिल पास होने के बाद से ही देश की राजनीति में इस पर विवाद छिड़ा है। माना जाता है कि इस कानून का लाभ सबसे अधिक पश्चिम बंगाल को मिलेगा, जहां बांग्लादेश से आए हिंदुओं की तादाद काफी है। 
मीडिया रिपोर्टस के अनुसार, मतुआ समुदाय की आबादी 3 करोड़ से ज्यादा है। उत्तरी और दक्षिणी 24 परगना जिले के मालदा, नदिया, दीनाजपुर, कूचबिहार जैसे बॉर्डर इलाके में मतुआ समुदाय के लोग बसे हैं। जब यह कानून लागू हुआ था, तब मतुआ समुदाय ने जश्न मनाया था। मगर चुनाव में टीएमसी ने सीएए को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए। पहला सवाल था कि जब मतुआ समुदाय के पास वोटर कार्ड और आधार कार्ड जैसे पक्के कागज हैं, तो उन्हें सीएए के तहत नागरिकता लेने की क्या जरूरत है?

दूसरा सवाल, 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के बाद धार्मिक उन्माद से जान बचाकर लोगों के पास ऐसा दस्तावेज नहीं है, फिर उन्हें नागरिकता कैसे मिलेगी? अब बनगांव के पुरबा जयनगर गांव में सीएए को लेकर भ्रम की स्थिति है। ऐसा ही हाल पूरे मतुआ समुदाय की है। पुरबा जयनगर के 60 वर्षीय श्रीकांत सरकार कहते हैं कि सीएए लागू होने के बाद भारत में एक स्थायी घर होने की उम्मीद जगी थी, मगर यह सपना टूट गया। सीएए के आवेदन के लिए बांग्लादेश का पासपोर्ट, जन्म प्रमाणपत्र या निवास प्रमाणपत्र की आवश्यकता है। 
उन्होंने बताया कि बांग्लादेश के सतखिरा में धार्मिक उत्पीडऩ के बाद उनके परिवार ने भारत आने का फैसला किया था, मगर दस्तावेज नहीं होने के कारण वह भारतीय नागरिक नहीं बन सकते हैं। मतुआ समुदाय के लिप्टन रे ने बताया कि बांग्लादेश की नागरिकता साबित करने वाले दस्तावेज कहां से मिलेंगे? किसी तरह जान बचाकर भारत आए उनके माता-पिता के पास पहने हुए कपड़ों के अलावा और कुछ भी नहीं था। सीएए के नियमों के बारे में लोगों को स्पष्ट जानकारी नहीं मिल पा रही है, इस कारण लोग सीएए के तहत ऑनलाइन आवेदन से झिझक रहे हैं। अब मतुआ समुदाय के लोग दस्तावेजों की अनिवार्यता खत्म करने की मांग कर रहे हैं। बनगांव के सायस्तानगर की निवासी रेखा बिस्वास चाहती हैं कि भारत सरकार उनके धर्म और घोषणा के आधार पर नागरिकता प्रदान करे। सीएए को लेकर बंगाल में एक और भ्रम फैल गया है। नामशूद्र कहे जाने वाले मतुआ समुदाय का कहना है कि अगर वह सीएए के तहत नागरिकता का आवेदन करते हैं, तो उन पर विदेशी होने का ठप्पा लग जाएगा। इसके बाद उनके वोटर कार्ड और राशन कार्ड जैसे दस्तावेज भी छिन जाएंगे। 
संगठन के नेताओं ने लोगों को अभी ऑनलाइन आवेदन नहीं करने की सलाह दे रखी है। अखिल भारतीय मतुआ महासंघ के महासचिव महितोष बैद्य ने बताया कि बांग्लादेश की नागरिकता को प्रमाणित करने वाले नियम के कारण ही लोग आवेदन नहीं कर रहे हैं। टीएमसी ने इस मुद्दे को भावनात्मक तौर से खूब उछाला है। बनगांव सीट से टीएमसी कैंडिडेट बिस्वजीत दास ने इस कहते हैं कि सीएए का धोखा अब खुलकर सामने आ गया है। मतुआ समुदाय के लोगों को एहसास हो गया है कि बीजेपी ने उन्हें कैसे बेवकूफ बनाया है। इस बीच मतुआ बाहुल्य वाले हरिनघाटा से बीजेपी विधायक असीम सरकार ने कहा कि लोगों को नियमों के सरल होने तक इंतजार करना चाहिए। उन्होंने बताया कि मतुआ समुदाय की इस दिक्कत के बारे में सरकार और पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को बताया गया है। उम्मीद है जल्द ही नियम में बदलाव हो। 
 

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