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रथयात्रा पर कामारपुकुर में जीवंत हुई सदियों पुरानी परंपरा, संतों ने किया प्रतीकात्मक धान रोपण

रथयात्रा के पावन अवसर पर गुरुवार को हुगली जिले के गोघाट स्थित कामारपुकुर में श्रीरामकृष्ण परमहंस के परिवार से जुड़ी एक ऐतिहासिक परंपरा एक बार फिर जीवंत हो उठी।

16 Jul 2026

रथयात्रा पर कामारपुकुर में जीवंत हुई सदियों पुरानी परंपरा, संतों ने किया प्रतीकात्मक धान रोपण

हुगली। रथयात्रा के पावन अवसर पर गुरुवार को हुगली जिले के गोघाट स्थित कामारपुकुर में श्रीरामकृष्ण परमहंस के परिवार से जुड़ी एक ऐतिहासिक परंपरा एक बार फिर जीवंत हो उठी। कामारपुकुर रामकृष्ण मठ के समीप स्थित ऐतिहासिक लक्ष्मीजला खेत में मठ के महराज और साधु-संतों ने पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार सामूहिक रूप से धान की रोपाई कर इस विरासत का निर्वहन किया।

कामारपुकुर रामकृष्ण मठ एवं मिशन के अध्यक्ष स्वामी लोकोत्तरानंदजी महाराज ने बताया कि श्रीरामकृष्ण परमहंस के पिता खुदीराम चट्टोपाध्याय जब अपने पैतृक गांव से कामारपुकुर आए थे, तब उनके घनिष्ठ मित्र सुखलाल गोस्वामी ने उन्हें लक्ष्मीजला में लगभग दो बीघा भूमि दान में दी थी। इसी भूमि से परिवार की कृषि आधारित आजीविका की शुरुआत हुई।

उन्होंने बताया कि परंपरा के अनुसार खुदीराम चट्टोपाध्याय हर वर्ष रथयात्रा के दिन अपने आराध्य भगवान रघुवीर का स्मरण कर स्वयं सबसे पहले धान की पौध रोपते थे। इसके बाद गांव के किसान पूरे खेत में धान की रोपाई करते थे। इसी खेत की फसल से परिवार का वर्षभर का भरण-पोषण होता था।

खुदीराम चट्टोपाध्याय के निधन के बाद इस परंपरा को कामारपुकुर रामकृष्ण मठ ने आगे बढ़ाया। तभी से प्रत्येक वर्ष रथयात्रा के दिन मठ के महराज और साधु-संत प्रतीकात्मक रूप से धान रोपकर उनके प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

इस वर्ष भी श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों की उपस्थिति में धार्मिक गरिमा और श्रद्धा के वातावरण में यह ऐतिहासिक परंपरा निभाई गई। यह आयोजन केवल कृषि कार्य का शुभारंभ नहीं, बल्कि श्रीरामकृष्ण परमहंस की पारिवारिक विरासत और बंगाल की समृद्ध कृषि संस्कृति का भी जीवंत प्रतीक माना जाता है।

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