कोलकाता। बंगाल के चुनावी रण में अब असली मुकाबला केवल उम्मीदवारों के बीच नहीं, बल्कि सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस और चुनाव आयोग के सिपाहसाहबों के बीच छिड़ गया है। कोलकाता में एक विस्फोटक प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए टीएमसी नेतृत्व ने उन पर्यवेक्षकों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है, जिन्हें चुनाव की शुचिता बनाए रखने की जिम्मेदारी दी गई थी। शिक्षा मंत्री ब्रात्य बसु और सांसद सायानी घोष ने जिस तरह से एक-एक अधिकारी का नाम लेकर उनके अतीत के दाग सार्वजनिक किए हैं, उसने राजनीतिक गलियारों में भूकंप ला दिया है।
टीएमसी का सीधा आरोप है कि ये अधिकारी निष्पक्ष नहीं, बल्कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के खास सिपहसालार हैं, जिन्हें एक खास एजेंडे के तहत बंगाल भेजा गया है। पार्टी ने इसे पर्यवेक्षकों का खेल करार देते हुए चार प्रमुख अधिकारियों पर भ्रष्टाचार और पक्षपात के गंभीर आरोप मढ़े हैं। बोंगांव से लेकर बालीगंज तक तैनात इन अफसरों के रिकॉर्ड खंगालते हुए टीएमसी ने दावा किया कि भाजपा शासित राज्यों में इनके कार्यकाल के दौरान करोड़ों के घोटाले और अनियमितताएं हुई थीं। मध्य प्रदेश के अजय कटेसारिया पर 40 एकड़ जमीन की बंदरबांट का आरोप हो या महाराष्ट्र के धीरज कुमार पर 8 हजार करोड़ के एम्बुलेंस टेंडर में धांधली का मामला टीएमसी ने स्पष्ट संदेश दिया है कि वह इन अधिकारियों को क्लीन चिट देने के मूड में नहीं है।
पार्टी का तर्क है कि जिन अधिकारियों पर खुद भ्रष्टाचार की जांच चली हो, वे बंगाल में निष्पक्ष चुनाव कैसे सुनिश्चित कर सकते हैं? बात सिर्फ आर्थिक अनियमितताओं तक सीमित नहीं रही; टीएमसी ने नैतिक और प्रशासनिक निष्पक्षता पर भी प्रहार किया है। ओडिशा के अजय डाकुआ को राजनीतिक गलियारों का संपर्क सूत्र बताकर और आंध्र प्रदेश के गांधीम चंद्रुडु पर व्यक्तिगत उत्पीडऩ के आरोप लगाकर पार्टी ने यह जताने की कोशिश की है कि आयोग के चयन मानक दोषपूर्ण हैं। ब्रात्य बसु का यह तंज कि बंगाल की सभी 294 सीटों पर मानो एक ही व्यक्ति (केंद्र) चुनाव लड़ रहा है, राज्य की स्वायत्तता और संघीय ढांचे पर बढ़ते दबाव की ओर इशारा करता है। यह एक्सपोज अभियान ऐसे समय में आया है जब बंगाल में चुनावी हिंसा और केंद्रीय बलों की तैनाती को लेकर पहले से ही तनाव चरम पर है। टीएमसी के इस हमले ने चुनाव आयोग को रक्षात्मक स्थिति में ला खड़ा किया है।
अब गेंद आयोग के पाले में है कि क्या वह इन आरोपों पर सफाई देगा या इन पर्यवेक्षकों के साथ ही चुनाव प्रक्रिया को आगे बढ़ाएगा? एक बात साफ है कि बंगाल की इस चुनावी जंग में अब फाइलों का शोर लाठियों की गूंज से भी ज्यादा तेज सुनाई दे रहा है।