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'शासक के जूतों तले कुचले जाते हैं विवेक और सच'
कोलकाता। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर छिड़ा सियासी संग्राम अब साहित्य के गलियारों तक पहुँच गया है। तृणमूल के अखिल भारतीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने इस विवादास्पद प्रक्रिया के खिलाफ अपना विरोध दर्ज कराने के लिए कविता का सहारा लिया है। 'मैं अस्वीकार करता हूं' शीर्षक वाली अपनी इस कविता में अभिषेक ने एसआईआर को केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि आम जनता पर थोपा गया 'दमनकारी शासन' करार दिया है। उन्होंने तीखा हमला बोलते हुए कहा कि शासक के बूटों तले आज लोगों का विवेक और सच कुचला जा रहा है। 150 मौतों को बताया मानवीय त्रासदी अभिषेक बनर्जी ने अपनी पंक्तियों के माध्यम से उन 150 लोगों की पीड़ा को स्वर दिया है, जिनकी इस प्रक्रिया के दौरान कथित तौर पर मृत्यु हुई है। उन्होंने लिखा कि ये महज सरकारी फाइल के आंकड़े नहीं हैं, बल्कि उन लोगों की चीखें हैं जो व्यवस्था की लगाई आग में झुलस गए हैं। कविता में उन्होंने 'खून पर स्याही के शासन' का जिक्र करते हुए आरोप लगाया कि राज्य के नाम पर आम नागरिक का सम्मान छीना जा रहा है। उनकी कविता की पंक्तियां— 'इतिहास माफ़ नहीं करता, वह सूचियां नहीं पढ़ता' सीधे तौर पर केंद्रीय एजेंसियों और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर कड़ा प्रहार करती नजर आती हैं।
ममता के बाद अब अभिषेक का 'काव्य-प्रतिरोध' गौरतलब है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पहले ही एसआईआर के विरोध में 26 कविताएं लिख चुकी हैं। अब अभिषेक बनर्जी का इस सूची में शामिल होना यह दर्शाता है कि तृणमूल कांग्रेस इस मुद्दे को केवल राजनीतिक मंचों तक सीमित नहीं रखना चाहती, बल्कि इसे जन-आंदोलन का रूप देने की तैयारी में है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अभिषेक की यह कविता युवाओं और भावनात्मक रूप से जुड़े मतदाताओं को गोलबंद करने का एक प्रयास है। कविता में उन्होंने बार-बार 'अस्वीकार' शब्द का प्रयोग कर यह साफ कर दिया है कि वे इस नई व्यवस्था के आगे झुकने वाले नहीं हैं। कलम, संसद और सड़क : हर मोर्चे पर घेराबंदी इस कविता के साथ ही अभिषेक बनर्जी ने यह संदेश भी दे दिया है कि टीएमसी एसआईआर के खिलाफ हर उपलब्ध मंच का उपयोग करेगी। जहाँ एक ओर वे संसद में इसे 'योजनाबद्ध तरीके से किया गया हमला' बता रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कविता के माध्यम से वे इसे जनता के स्वाभिमान से जोड़ रहे हैं। भाजपा ने हालांकि इसे टीएमसी का 'डर' करार दिया है, लेकिन अभिषेक की इस काव्य-रचना ने बंगाल की राजनीति में एक नई बहस छेड़ दी है कि क्या वाकई 2026 की लड़ाई केवल वोटों की नहीं, बल्कि अस्मिता और न्याय की भी होगी।