सेवाश्रय के उद्घाटन से बनाई दूरी, शहीदों के परिवारों को आगे किया
कोलकात। बंगाल की राजनीति का केंद्र बिंदु रहे नंदीग्राम में गुरुवार से शुरू हो रहे स्वास्थ्य सेवा शिविर 'सेवाश्रयÓ को लेकर तृणमूल ने ऐन वक्त पर अपनी रणनीति बदल दी है। पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी, जिन्होंने खुद इस कार्यक्रम के उद्घाटन की घोषणा की थी, अब इसका औपचारिक उद्घाटन नहीं करेंगे। इसके बजाय, तृणमूल ने नंदीग्राम आंदोलन के 19 शहीद परिवारों को सम्मान देते हुए उनके हाथों शिविर की शुरुआत कराने का निर्णय लिया है।
राजनीतिक विश्लेषक इसे शुभेंदु अधिकारी के गढ़ में सेंध लगाने के लिए तृणमूल का बड़ा इमोशनल कार्ड मान रहे हैं। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार, नंदीग्राम के दोनों ब्लॉकों में सुबह 9 बजे ही उद्घाटन प्रक्रिया संपन्न हो जाएगी। अभिषेक बनर्जी दोपहर में नंदीग्राम पहुंचेंगे और केवल सेवा शिविरों के मॉडल और व्यवस्थाओं का निरीक्षण करेंगे। गौरतलब है कि एक डाके अभिषेक हेल्पलाइन पर मिली शिकायतों और अनुरोधों के बाद इस विशेष स्वास्थ्य शिविर की योजना बनाई गई थी। नंदीग्राम में आज भी कई शहीद परिवारों का झुकाव नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी की ओर माना जाता है। शुभेंदु के भाजपा में जाने के बाद से ही तृणमूल यहाँ एक मजबूत स्थानीय नेतृत्व के लिए संघर्ष कर रही है। ऐसे में शहीद परिवारों को मुख्यधारा में लाकर तृणमूल यह संदेश देना चाहती है कि वह आज भी आंदोलनकारियों के साथ खड़ी है। नंदीग्राम से पार्षद व कार्यक्रम के प्रभारी सुशांत घोष ने कहा कि दूसरी पार्टियां लाशों पर राजनीति करती हैं, लेकिन तृणमूल शहीदों का सम्मान करना जानती है। इसीलिए उद्घाटन का अधिकार उनके परिवारों को दिया गया है।
2021 के विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को इसी नंदीग्राम सीट से शुभेंदु अधिकारी के हाथों हार का सामना करना पड़ा था। आगामी चुनावों से करीब तीन महीने पहले 'सेवाश्रयÓ के जरिए स्वास्थ्य सेवाओं का जाल बिछाना, उसी चुनावी हार के जख्म पर मरहम लगाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। इस कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए अभिषेक बनर्जी ने 5 जनवरी से ही अपनी कोर टीम को मैदान में उतार दिया था जिसमें ब्लॉक-1: पार्टी प्रवक्ता ऋजु दत्त पूरी कमान संभाल रहे हैं जबकि ब्लॉक-2 कोलकाता के वार्ड-108 के पार्षद सुशांत घोष निगरानी कर रहे हैं। नंदीग्राम में अभिषेक बनर्जी का सीधा उद्घाटन न करना एक सोची-समझी रणनीति है। इससे वे खुद को किसी भी संभावित विरोध से बचाते हुए सीधे जनता से जुडऩे का रास्ता साफ कर रहे हैं, जबकि शहीद परिवारों को आगे कर उन्होंने सीधे तौर पर शुभेंदु अधिकारी की आंदोलनकारी छवि को चुनौती दी है।