तारातला में निर्माणाधीन गोदाम की छत ढही, 3 मजदूरों की मौत, 18 को बचाया गया
वहीं निर्माण कार्यों में बरती जाने वाली लापरवाही और सुरक्षा मानकों को लेकर भी एक गंभीर और कड़वा सवाल खड़ा कर दिया है
कोलकाता। दोपहर के ठीक 12 बजकर 7 मिनट हुए थे। अचानक एक ऐसा भयावह धमाका हुआ जिससे लगा कि जैसे बहुत तेज भूकंप आ गया हो। धरती कांप उठी और जब तक हम कुछ समझ पाते, आंखों के सामने वह विशालकाय 5 मंजिला ढांचा ताश के पत्तों की तरह बिखर गया। चारों तरफ सिर्फ मौत का सन्नाटा और धूल का ऐसा गुबार था कि हाथ को हाथ सुझाई नहीं दे रहा था। तारातला हादसे के प्रत्यक्षदर्शियों ने जब उस खौफनाक मंजर को बयां किया, तो सुनने वालों की रूह कांप उठी। बुधवार को ब्रेसब्रिज-तारातला इलाके में एक निर्माणाधीन चाय गोदाम की छत ढहने से जो कयामत टूटी, उसने पूरे महानगर को झकझोर कर रख दिया है।
ट्रांसपोर्ट डिपो रोड स्थित इस परिसर में करीब 2 साल पहले पुराने गोदाम को तोड़कर नए सिरे से निर्माण कार्य शुरू किया गया था। पोर्ट ट्रस्ट की जमीन पर बेहेरा ब्रदर्स के बैनर तले शंभूनाथ बेहेरा के इस प्रोजेक्ट का काम ठेकेदार आसगर खान संभाल रहा था। स्थानीय लोगों का कहना है कि लगातार हो रही बारिश के कारण निर्माणाधीन छत का ढांचा कमजोर हो गया था और सुबह से ही उसमें हल्की हलचल दिख रही थी। कुछ मजदूर स्थिति को समझने के लिए आगे बढ़े ही थे कि तभी अचानक लोहे की भारी-भरकम बीमों और टनों वजनी कंक्रीट के साथ पूरी इमारत भरभराकर गिर पड़ी। ढलाई के काम में जुटे दर्जनों बेकसूर मजदूर पलक झपकते ही उस मलबे के क्रूर शिकंजे में दफन हो गए।
चाय गोदाम के एक अधिकारी उज्ज्वल कुमार और कोलकाता पोर्ट ट्रस्ट के सुरक्षाकर्मी अशोक कुमार राय ने बताया कि हादसे का दृश्य इतना हृदयविदारक था कि उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। कंक्रीट के नीचे दबे अपनों को तलाशने के लिए घटनास्थल पर चीख-पुकार मची हुई है। अपनों को खो चुके परिवारों के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। रोते-बिलखते एक बेबस युवक ने बताया कि मेरी मौसी इसी गोदाम में काम कर रही थीं। हादसे के बाद से उनका कोई अता-पता नहीं है। मैं घंटों से मलबे के चक्कर काट रहा हूं, लेकिन कोई उनकी खबर नहीं दे पा रहा है। ऐसे न जाने कितने ही बदनसीब परिवार हैं, जिनकी उम्मीदें उस मलबे के ढेर में दम तोड़ रही हैं।
तारातला की इस भीषण त्रासदी के बाद अब लोहे और कंक्रीट के पहाड़ को चीरकर जिंदगियां तलाशने का काम युद्धस्तर पर जारी है। खबर लिखें जाने तक भारतीय सेना, एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, दमकल विभाग और कोलकाता पुलिस के जवान भारी-भरकम हाइड्रोलिक क्रेन की मदद से लोहे के विशाल गार्डर्स को हटाने में जुटे हैं। कयामत की उस रात के सन्नाटे में राहतकर्मी हैंड माइक के जरिए मलबे के सुराखों में आवाज लगा-लगाकर यह जानने की बेताब कोशिश कर रहे हैं कि अंदर कोई सांस बची है या नहीं। इस दिल दहला देने वाले हादसे ने जहां कई हंसते-खेलते परिवारों को उम्र भर का दर्द दे दिया है, वहीं निर्माण कार्यों में बरती जाने वाली लापरवाही और सुरक्षा मानकों को लेकर भी एक गंभीर और कड़वा सवाल खड़ा कर दिया है।