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शुभेंदु अधिकारी को इस ऐतिहासिक रैली के लिए कोई औपचारिक न्योता ही नहीं भेजा गया
कोलकाता। विधानसभा चुनाव के महासमर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहली चुनावी जनसभा ने राज्य का सियासी पारा सातवें आसमान पर पहुँचा दिया है, लेकिन कूचबिहार के रासमेला मैदान में हुई इस रैली ने जीत के दावों से कहीं ज्यादा अपनों की गैरमौजूदगी पर सवाल खड़े कर दिए हैं। भाजपा के कद्दावर नेता और नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी का इस हाई-प्रोफाइल रैली से नदारद रहना न केवल चौंकाने वाला है, बल्कि इसने पार्टी के भीतर मचे घमासान और गुटबाजी की सुगबुगाहट को सार्वजनिक कर दिया है। बताया जा रहा है कि मंच पर उनके लिए जगह तो तय थी, लेकिन पोस्टर बॉय की कुर्सी अंत तक खाली ही रही। इस अनुपस्थिति को लेकर जो सबसे चौंकाने वाली बात सामने आ रही है, वह है निमंत्रण का अभाव।
भाजपा के आंतरिक सूत्रों का दावा है कि राज्य संगठन महासचिव अमिताभ चक्रवर्ती की ओर से शुभेंदु अधिकारी को इस ऐतिहासिक रैली के लिए कोई औपचारिक न्योता ही नहीं भेजा गया। यह प्रशासनिक चूक है या कोई सोची-समझी रणनीतिक दूरी, इसे लेकर राजनीतिक पंडितों ने गुणा-भाग शुरू कर दिया है। जहाँ एक तरफ पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सुकांत मजूमदार और शमिक भट्टाचार्य मंच पर प्रधानमंत्री के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े नजर आए, वहीं बंगाल में भाजपा का सबसे बड़ा चेहरा माने जाने वाले शुभेंदु का गायब होना संगठन के भीतर गहरे मतभेदों की ओर इशारा कर रहा है। हैरानी की बात यह है कि शुभेंदु अधिकारी उस वक्त अपने गढ़ नंदीग्राम में चुनावी जनसंपर्क में व्यस्त थे।
राजनीतिक परंपरा के अनुसार, जिन राज्यों में भाजपा विपक्ष में होती है, वहां नेता प्रतिपक्ष की भूमिका बेहद अहम होती है और प्रधानमंत्री के दौरों पर उनका मौजूद रहना अनिवार्य माना जाता है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या संगठन के शीर्ष स्तर पर जानबूझकर उन्हें किनारे करने की कोशिश की जा रही है? इससे पहले भी राष्ट्रीय नेताओं की बैठकों और नितिन नवीन जैसे प्रभारियों के कार्यक्रमों में सूचना न मिलने या देरी से निमंत्रण मिलने की शिकायतें सामने आ चुकी हैं, जिसने ऑल इज नॉट वेल के संकेतों को और पुख्ता किया है।
प्रधानमंत्री की पहली रैली किसी भी राज्य में कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने के लिए सबसे बड़ा हथियार होती है, लेकिन यहाँ एकजुटता दिखाने के बजाय गुटबाजी की परतें खुलती दिख रही हैं। हालांकि, शुभेंदु अधिकारी और उनके करीबियों ने इस पूरे विवाद पर फिलहाल चुप्पी साध रखी है, लेकिन पर्दे के पीछे की नाराजगी किसी से छिपी नहीं है। चुनावी रणभेरी बजने के बाद इस तरह का तालमेल का अभाव न केवल विपक्षी तृणमूल कांग्रेस को हमलावर होने का मौका दे रहा है, बल्कि जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं के बीच भी संशय पैदा कर रहा है। अब देखना यह होगा कि दिल्ली दरबार इस अंदरूनी कलह को शांत करने के लिए क्या कदम उठाता है और आने वाली रैलियों में यह दूरी कम होती है या खाई और बढ़ती है।