पार्टी दफ्तार में संग्राम, लॉकेट के 'तेवरों' ने भड़काई बगावत की आग
कोलकाता। विधानसभा चुनाव की दहलीज पर खड़ी भाजपा के लिए बाहरी दुश्मनों से ज्यादा अब भीतरी बगावत सिरदर्द बनती जा रही है। शुक्रवार को सॉल्टलेक स्थित राज्य भाजपा मुख्यालय रणक्षेत्र में तब्दील हो गया, जब बेलियाघाटा सीट से उम्मीदवार चयन के विरोध में कार्यकर्ताओं का गुस्सा फूट पड़ा। पार्टी ने यहाँ से पार्थ चौधरी को मैदान में उतारा है, लेकिन स्थानीय कार्यकर्ताओं को यह नाम किसी कीमत पर मंजूर नहीं है। विरोध की यह चिंगारी उस वक्त शोले में बदल गई जब फायरब्रांड नेता और सांसद लॉकेट चटर्जी को उग्र कार्यकर्ताओं के घेराव का सामना करना पड़ा। सॉल्टलेक में मचे इस घमासान के दौरान मंजर तब और गर्मा गया जब प्रदर्शनकारी कार्यकर्ताओं ने लॉकेट चटर्जी की गाड़ी रोक ली और जमकर नारेबाजी की। प्रत्यक्षदर्शियों का आरोप है कि प्रदर्शन शांत कराने के बजाय लॉकेट चटर्जी ने कार्यकर्ताओं को उंगली दिखाकर अनुशासन का पाठ पढ़ाने या कथित तौर पर धमकाने की कोशिश की। नेता और कार्यकर्ता के बीच की यह तल्खी कैमरे में कैद हो गई, जिसने भाजपा के उस दावे की पोल खोल दी जिसमें वह खुद को काडर आधारित अनुशासित पार्टी बताती है।
कार्यकर्ताओं का साफ कहना है कि दिल्ली और कोलकाता के वातानुकूलित कमरों में बैठकर थोपे गए उम्मीदवार उन्हें स्वीकार नहीं हैं। बेलियाघाटा के नाराज खेमे का तर्क है कि पार्थ चौधरी की उम्मीदवारी जमीन से कटे हुए नेतृत्व का फैसला है। अब तक 255 सीटों पर उम्मीदवारों का एलान कर चुकी भाजपा के लिए बेलियाघाटा महज एक उदाहरण है; राज्य के मैदानी इलाकों से लेकर पहाड़ों तक, असंतोष की ऐसी ही लहरें उठ रही हैं। कई सीटों पर तो नेताओं ने यहाँ तक चेतावनी दे दी है कि अगर उम्मीदवार नहीं बदले गए, तो वे कमल को छोड़कर निर्दलीय चुनावी मैदान में उतर जाएंगे। अपनों की यह बगावत भाजपा के मिशन बंगाल के रथ के पहिये जाम करती दिख रही है। भाजपा के इस अंदरूनी दंगल पर तृणमूल ने नमक छिड़कने में देर नहीं की। टीएमसी के राज्य उपाध्यक्ष जयप्रकाश मजूमदार ने चुटकी लेते हुए कहा कि भाजपा नेतृत्व पूरी तरह जमीन से कट चुका है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि जो पार्टी अपने कार्यकर्ताओं का भरोसा नहीं जीत पा रही, वह जनता का विश्वास क्या जीतेगी? दिल्ली के रिमोट कंट्रोल से बंगाल नहीं चलता। तृणमूल का दावा है कि भाजपा का यह अंतर्कलह ममता की राह और आसान कर देगा। चुनाव से ठीक पहले इस तरह का सार्वजनिक हंगामा भाजपा के लिए अलार्म बेल है। अगर बेलियाघाटा जैसी सीटों पर डैमेज कंट्रोल नहीं किया गया, तो चुनावी नतीजों में इसका बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।
फिलहाल, पुलिस ने हस्तक्षेप कर हालात काबू में किए हैं, लेकिन कार्यकर्ताओं के दिलों में लगी बगावत की आग बुझती नहीं दिख रही। अब देखना यह है कि पार्टी आलाकमान झुककर उम्मीदवार बदलता है या फिर इन बागी सुरों को कुचलने का रास्ता अपनाता है।