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चौरंगी में बदलते सियासी संकेत : क्या इस बार संतोष पाठक छीन लेंगे तृणमूल की परंपरागत सीट

वहीं तृणमूल अपनी संगठनात्मक ताकत और पारंपरिक वोट बैंक के भरोसे इस सीट को बचाए रखने की पूरी कोशिश में है

06 Apr 2026

चौरंगी में बदलते सियासी संकेत : क्या इस बार संतोष पाठक छीन लेंगे तृणमूल की परंपरागत सीट

कोलकाता। पश्चिम बंगाल की सबसे प्रतिष्ठित और हाई प्रोफाइल शहरी विधानसभा सीटों में शामिल चौरंगी में इस बार का चुनाव बेहद रोचक होता जा रहा है। लंबे समय से तृणमूल कांग्रेस के कब्जे वाली इस सीट पर इस बार भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के उम्मीदवार संतोष पाठक ने मुकाबले को असाधारण रूप से दिलचस्प बना दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार चुनाव केवल पार्टी बनाम पार्टी नहीं बल्कि चेहरे बनाम चेहरा हो गया है, जहां व्यक्तिगत जनाधार परिणाम को प्रभावित कर सकता है।
काफी समृद्ध है राजनीतिक इतिहास
कोलकाता के व्यावसायिक और सांस्कृतिक केंद्र माने जाने वाले चौरंगी विधानसभा क्षेत्र का राजनीतिक इतिहास काफी समृद्ध रहा है। 1957 में अस्तित्व में आई इस सीट पर शुरूआती दशकों में कांग्रेस का दबदबा रहा और बाद में तृणमूल कांग्रेस ने यहां अपनी मजबूत पकड़ बना ली। 2001 से लेकर अब तक तृणमूल लगातार इस सीट पर जीत दर्ज करती रही है, जिससे यह सीट पार्टी का सुरक्षित गढ़ मानी जाती रही है।

वर्तमान विधायक नैना बनर्जी, जो वरिष्ठ तृणमूल नेता और सांसद सुदीप बनर्जी की पत्नी हैं, इस सीट पर लगातार जीत हासिल करती रही हैं। 2014 के उपचुनाव में जीत से शुरू हुआ उनका सफर 2016 और 2021 में भी जारी रहा। 2021 में उन्होंने भाजपा उम्मीदवार को 45 हजार 344 वोटों के बड़े अंतर से हराकर अपनी मजबूत स्थिति साबित की थी। उनके पक्ष में तृणमूल का मजबूत संगठन, अल्पसंख्यक मतदाताओं का समर्थन और स्थानीय नेटवर्क को बड़ी ताकत माना जाता है।
संतोष पाठक का है बड़ा जनाधार
हालांकि इस बार मुकाबला पहले जैसा आसान नहीं दिख रहा। भाजपा ने संतोष पाठक को उम्मीदवार बनाकर चुनाव को नई दिशा दे दी है। संतोष पाठक का राजनीतिक सफर कांग्रेस से शुरू हुआ था और लंबे समय तक इलाके में सक्रिय रहने के कारण उनकी व्यक्तिगत पहचान और सामाजिक स्वीकार्यता मजबूत मानी जाती है। यही कारण है कि उन्हें केवल भाजपा कार्यकर्ताओं का ही नहीं बल्कि अन्य दलों के समर्थकों का भी एक वर्ग पसंद करता है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि संतोष पाठक की सबसे बड़ी ताकत उनकी व्यक्तिगत छवि और जमीनी संपर्क है। हिंदी भाषी मतदाताओं, व्यापारियों और पारंपरिक कांग्रेस समर्थकों के बीच उनकी पकड़ भाजपा के लिए इस सीट पर नया समीकरण बना सकती है। खासतौर पर यह भी माना जा रहा है कि यदि कांग्रेस और वामपंथी दलों का पारंपरिक वोट पूरी तरह उनके साथ नहीं जाता और उसका एक हिस्सा भाजपा के हिस्से में जाता है तो मुकाबला तृणमूल के लिए कठिन हो सकता है।
मुस्लिम मतदाता हैं निर्णायक
चौरंगी सीट का सामाजिक समीकरण भी इस चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला है। यहां लगभग 37 प्रतिशत अल्पसंख्यक मतदाता हैं, जो अब तक तृणमूल के साथ मजबूती से जुड़े रहे हैं। यदि यह समर्थन इस बार भी कायम रहता है तो नैना बनर्जी को फायदा मिल सकता है। लेकिन भाजपा जिस तरह शहरी मतदाताओं, मध्यवर्ग और बंगाली वोटरों को साधने की कोशिश कर रही है, उससे चुनाव का गणित बदल भी सकता है।
पिछले कुछ चुनावी आंकड़े भी संकेत देते हैं कि भाजपा इस क्षेत्र में धीरे-धीरे अपनी जमीन मजबूत कर रही है। 2019 के बाद से पार्टी मुख्य चुनौती देने वाली ताकत बनकर उभरी है। वहीं कांग्रेस का वोट प्रतिशत गिरने के बाद हाल के चुनावों में थोड़ा बढ़ा जरूर है, लेकिन वह अभी भी निर्णायक स्थिति में नहीं दिखती। ऐसे में कांग्रेस-वाम गठबंधन की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है, क्योंकि उनके वोट किस दिशा में जाते हैं, यह परिणाम को प्रभावित कर सकता है।
चौरंगी पूरी तरह शहरी सीट है जहां मतदान प्रतिशत अपेक्षाकृत कम रहता है और आमतौर पर संगठित वोट और उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि ज्यादा असर डालती है। यही वजह से इस बार भी पार्टी से ज्यादा उम्मीदवार की स्वीकार्यता को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
चुनावी विश्लेषकों का मानना है कि यदि संतोष पाठक विपक्षी मतों को एकजुट करने में सफल रहते हैं और अपनी व्यक्तिगत लोकप्रियता को वोट में बदल पाते हैं तो यह सीट तृणमूल के हाथ से निकल भी सकती है। वहीं तृणमूल अपनी संगठनात्मक ताकत और पारंपरिक वोट बैंक के भरोसे इस सीट को बचाए रखने की पूरी कोशिश में है।
कुल मिलाकर चौरंगी में इस बार मुकाबला बेहद कांटे का माना जा रहा है। एक तरफ तृणमूल के सामने अपनी प्रतिष्ठा बचाने की चुनौती है तो दूसरी तरफ भाजपा इस सीट को कोलकाता की राजनीति में बड़ी प्रतीकात्मक जीत में बदलने की कोशिश कर रही है। ऐसे में अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि क्या संतोष पाठक तृणमूल के मजबूत किले में सेंध लगा पाएंगे या नैना बनर्जी एक बार फिर अपनी जीत की परंपरा को कायम रखेंगी।

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