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धर्मतला में भारी बवाल के बाद थमी शहर की रफ्तार
कोलकाता। सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेश के बावजूद महंगाई भत्ता (डीए) न मिलने से आक्रोशित राज्य सरकार के कर्मचारियों ने गुरुवार को कोलकाता की सड़कों पर जोरदार शक्ति प्रदर्शन किया। 'संग्रामी संयुक्त मंच' के आह्वान पर आयोजित इस 'कालीघाट अभियानÓ ने मध्य कोलकाता के जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया। पुलिस द्वारा रैली को रोके जाने के बाद प्रदर्शनकारियों ने धर्मतला के मेट्रो चैनल पर ही डेरा डाल दिया, जिससे घंटों तक यातायात व्यवस्था पूरी तरह ठप रही। दोपहर करीब एक बजे जब कर्मचारियों का हुजूम कालीघाट (मुख्यमंत्री आवास क्षेत्र) की ओर बढऩे लगा, तो पुलिस ने सुरक्षा का हवाला देते हुए उन्हें लिंडसे स्ट्रीट के पास रोक दिया। प्रशासन ने इस रैली को अनुमति नहीं दी थी, जिसके चलते इलाके को छावनी में तब्दील कर दिया गया था। डीसी सेंट्रल इंदिरा मुखोपाध्याय की मौजूदगी में पुलिस और आंदोलनकारियों के बीच तीखी बहस हुई। आगे बढऩे का रास्ता न मिलने पर प्रदर्शनकारी सड़क पर ही धरने पर बैठ गए, जिससे धर्मतला, स्ट्रैंड रोड और चित्तरंजन एवेन्यू जैसे व्यस्त इलाकों में वाहनों की लंबी कतारें लग गईं।
आंदोलन का नेतृत्व कर रहे संग्रामी संयुक्त मंच के संयुक्त संयोजक भास्कर घोष ने राज्य सरकार पर अदालत की अवमानना का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि 5 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया था कि 25 प्रतिशत बकाया डीए का तत्काल भुगतान किया जाए और 6 मार्च तक बाकी राशि का रोडमैप तैयार हो, लेकिन सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही है। कर्मचारियों ने चेतावनी दी कि जब तक 31 मार्च की डेडलाइन को लेकर ठोस प्रशासनिक आदेश जारी नहीं होता, आंदोलन थमेगा नहीं। प्रदर्शन के कारण कोलकाता का हृदय स्थल धर्मतला पूरी तरह जाम की चपेट में रहा। दफ्तर जाने वाले लोग, एंबुलेंस और स्कूली बसें घंटों फंसी रहीं। कई यात्रियों को बसें छोड़कर पैदल ही गंतव्य की ओर जाना पड़ा। शाम ढलने तक ट्रैफिक पुलिस स्थिति को सामान्य करने के लिए संघर्ष करती दिखी, लेकिन प्रदर्शनकारियों की भारी संख्या के आगे व्यवस्था बौनी नजर आई। उल्लेखनीय है कि न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने बंगाल सरकार को बकाया डीए का एक चौथाई हिस्सा तुरंत जारी करने को कहा था। अदालत ने एक चार सदस्यीय समिति गठित कर 15 अप्रैल तक अनुपालन रिपोर्ट सौंपने का भी आदेश दिया था। कर्मचारियों का कहना है कि सरकार इस कानूनी प्रक्रिया में देरी कर उनके हक को मार रही है।