इस सप्ताह हुई एक घटना अल्पसंख्यक बहुल मुर्शिदाबाद जिले के फरक्का स्थित सुनवाई केंद्र की है, जहां कथित तौर पर सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने फरक्का विधानसभा क्षेत्र के विधायक मनीरुल इस्लाम के नेतृत्व में तोड़फोड़ की।
कोलकाता। पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के मसौदे पर दावे और आपत्तियों की सुनवाई के दौरान हुई हिंसा और तोड़फोड़ की घटनाओं को लेकर समय पर कार्रवाई न करने पर भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) दो जिला निर्वाचन अधिकारियों (डीईओ) से नाराज़ बताया जा रहा है। ये दोनों अधिकारी संबंधित जिलों के जिलाधिकारी भी हैं।
इस सप्ताह हुई एक घटना अल्पसंख्यक बहुल मुर्शिदाबाद जिले के फरक्का स्थित सुनवाई केंद्र की है, जहां कथित तौर पर सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने फरक्का विधानसभा क्षेत्र के विधायक मनीरुल इस्लाम के नेतृत्व में तोड़फोड़ की। इस मामले में निर्वाचन आयोग ने मुर्शिदाबाद के जिलाधिकारी व डीईओ को गुरुवार तक विधायक मनीरुल इस्लाम के खिलाफ प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज करने और उसी दिन इसकी सूचना आयोग को देने का निर्देश दिया था। हालांकि, शनिवार सुबह तक आयोग के आदेश के अनुपालन की कोई जानकारी नहीं मिली, यह पुष्टि मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ), पश्चिम बंगाल कार्यालय के सूत्रों ने की।
इसी तरह का एक और मामला उत्तर दिनाजपुर जिले के इटाहार स्थित सुनवाई केंद्र में हुई तोड़फोड़ से जुड़ा है। इस मामले में भी आयोग ने संबंधित डीईओ से जल्द से जल्द विस्तृत रिपोर्ट मांगी थी, लेकिन शनिवार सुबह तक उस निर्देश का भी पालन नहीं हुआ।
सीईओ कार्यालय के एक वरिष्ठ सूत्र ने बताया कि आयोग ने राज्य के सभी डीईओ को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि सुनवाई केंद्रों पर तोड़फोड़ या हिंसा की घटनाओं को हल्के में न लिया जाए और ऐसे मामलों में तुरंत स्थानीय थाने में एफआईआर दर्ज कराई जाए।
सूत्र के अनुसार, “निर्वाचन आयोग ने डीईओ को यह भी चेतावनी दी है कि ऐसे मामलों में आदेशों की अवहेलना या एफआईआर दर्ज करने में अनावश्यक देरी होने पर उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई भी की जा सकती है।”
इस बीच, शुक्रवार को पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी ने विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया के दौरान आ रही बाधाओं, विशेषकर सुनवाई केंद्रों पर सत्तारूढ़ दल के लोगों द्वारा की जा रही गुंडागर्दी को लेकर निर्वाचन आयोग पर नरमी बरतने का आरोप लगाया।
उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि आयोग सुनवाई केंद्रों पर केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों की तैनाती क्यों नहीं कर रहा है। शुभेंदु अधिकारी ने कहा, “भारत के संविधान ने निर्वाचन आयोग को सर्वोच्च अधिकार दिए हैं। यदि आयोग चाहे तो बिना किसी से परामर्श किए केंद्रीय बलों की तैनाती कर सकता है। आवश्यकता पड़ने पर आयोग सेना की तैनाती भी कर सकता है।”