वैभव सूर्यवंशी का लिस्ट-ए क्रिकेट में सबसे तेज अर्धशतक, महज 29 गेंदों में 94 रन ठोक दिए
ऋतोब्रत गुट के साथ दिखे 38 विधायक, कालीघाट खेमे में रह गए सिर्फ 14
कोलकाता। विधानसभा के नए सत्र के पहले ही दिन प्रमुख विपक्षी पार्टी तृणमूल भीतर चल रही वर्चस्व की जंग और गहराता विभाजन पूरी तरह सतह पर आ गया। राज्य में भाजपा सरकार के गठन के बाद गुरुवार को शुरू हुए पहले सत्र के दौरान तृणमूल के विधायक सदन के भीतर एक रहने के बजाय दो अलग-अलग खेमों में बंटे नजर आए। एक तरफ विधानसभा में विपक्ष के नेता ऋतोब्रत बंद्योपाध्याय के नेतृत्व वाले बागी समूह के साथ 38 विधायक मुस्तैद दिखे, तो दूसरी तरफ ममता बनर्जी के प्रति वफादार माना जाने वाला कालीघाट खेमा महज 14 विधायकों के साथ सिमटा हुआ नजर आया। दोनों गुटों के इस तरह अलग-अलग बैठने से यह साफ हो गया है कि पार्टी के भीतर सांगठिनक दरार अब एक बड़े सियासी संकट का रूप ले चुकी है।
सदन की कार्यवाही के दौरान उस समय सबसे ज्यादा चौंकाने वाली स्थिति बनी, जब पूर्व मंत्री और कभी ममता बनर्जी के सबसे खासमखास रहे फिरहाद हकीम उर्फ बबी हकीम सीधे ऋतोब्रत बंद्योपाध्याय और संदीपन साहा के साथ विपक्षी बेंच पर जाकर बैठ गए। बबी हकीम का इस विद्रोही पाले में नजर आना राजनीतिक गलियारों में बड़ा संदेश दे गया कि पार्टी के भीतर शक्ति संतुलन अब तेजी से बदल रहा है। इसके विपरीत, वफादार कालीघाट खेमे की तरफ से शोभनदेव चट्टोपाध्याय, मदन मित्र, कुणाल घोष, रुकबानुर रहमान और अलिफा अहमद जैसे गिने-चुने चेहरे ही मोर्चा संभालते दिखे। इस फूट का असर सिर्फ विधानसभा तक सीमित नहीं है, बल्कि पार्टी के संसदीय दल के करीब 20 सांसदों के भी बागी रुख अपनाने की चर्चा है, जिनमें सुदीप बंद्योपाध्याय का नाम भी शामिल है। हालांकि, उनकी पत्नी और विधायक नयना बंद्योपाध्याय को इस दौरान कालीघाट समर्थक विधायकों के साथ ही बैठे देखा गया।
इस पूरे विवाद की जड़ें विधानसभा चुनाव के बाद नेता विपक्ष के पद को लेकर शुरू हुई थीं। चुनाव में 80 सीटें जीतकर मुख्य विपक्षी दल बनी तृणमूल की अध्यक्ष ममता बनर्जी ने शोभनदेव चट्टोपाध्याय को विपक्ष का नेता नियुक्त करने के लिए 9 मई को विधानसभा अध्यक्ष को पत्र भेजा था, जिस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। इसके उलट ऋतोब्रत बंद्योपाध्याय खेमे ने 58 विधायकों के समर्थन का दावा ठोकते हुए विपक्ष के नेता का पद हासिल कर लिया, जिस पर बाद में हस्ताक्षर जालसाजी के आरोप भी लगे। हालांकि, पार्टी विरोधी गतिविधियों के कारण तृणमूल नेतृत्व ने 1 जून को ही ऋतोब्रत को निष्कासित कर दिया था, लेकिन इसके बावजूद तकनीकी रूप से वह सदन में मजबूत बने हुए हैं।