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काकोली का दावा—20 नहीं 22 सांसद साथ
कोलकाता। बंगाल विधानसभा चुनाव में करारी शिकस्त झेलने के बाद तृणमूल के भीतर भड़का असंतोष अब राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की दहलीज तक आ पहुंचा है। संसद के आगामी सत्र से ठीक पहले पार्टी के भीतर मचे इस घमासान ने न सिर्फ ममता बनर्जी के संसदीय वजूद को हिलाकर रख दिया है, बल्कि लोकसभा में टीएमसी को राजनीतिक रूप से पूरी तरह हाशिये पर धकेलने की जमीन तैयार कर दी है। वरिष्ठ सांसद काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में उभरे बागी सुरों ने यह साफ कर दिया है कि पार्टी के भीतर का असंतोष अब सिर्फ आंतरिक कलह नहीं, बल्कि एक सुनियोजित संसदीय तख्तापलट की कोशिश है। दिल्ली रवाना होने से पहले काकोली घोष दस्तीदार का यह दावा कि उनके साथ 20 नहीं बल्कि 22 सांसद हैं, ममता और अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व वाले आधिकारिक खेमे के पैरों तले जमीन खिसकाने के लिए काफी है।
राजनीतिक गलियारों में बागियों के इस संख्या बल को दलबदल कानून की ढाल के तौर पर देखा जा रहा है। कुल 28 सांसदों वाली तृणमूल के सामने अगर 22 सांसद बागी रुख अख्तियार करते हैं, तो वे तकनीकी रूप से दो-तिहाई के आंकड़े को पार कर लेंगे। ऐसे में वे खुद को वास्तविक तृणमूल या एक अलग संसदीय ब्लॉक के रूप में मान्यता दिलाने की कानूनी अर्हता आसानी से पार कर लेंगे। सोमवार को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात की तैयारी और सुदीप बंद्योपाध्याय को संसदीय दल का नया नेता बनाने का प्रस्ताव इसी रणनीति का हिस्सा है। इस बीच, रविवार को दिल्ली में आयोजित बागी सांसदों के हाई-प्रोफाइल रात्रिभोज में देव, सायनी घोष, रचना बंद्योपाध्याय और यूसुफ पठान जैसे बड़े और ग्लैमरस चेहरों की मौजूदगी ने यह साफ संदेश दे दिया है कि बगावत की जड़ें पार्टी में कितनी गहरी हो चुकी हैं।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा राजनीतिक पहलू यह है कि दिल्ली के इस शक्ति प्रदर्शन ने संसद के भीतर ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व को पूरी तरह अलग-थलग कर दिया है। जहाँ एक तरफ बागी खेमा केंद्र सरकार और एनडीए के साथ मिलकर बंगाल के विकास का नया नैरेटिव गढऩे की कोशिश में जुटा है, वहीं ममता बनर्जी के प्रति वफादार रहे कल्याण बनर्जी, महुआ मोइत्रा और सौगत राय जैसे चंद नेता अब केवल रक्षात्मक मुद्रा में नजर आ रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर यह बगावत अपने मुकाम तक पहुंचती है, तो संसद में मुख्यधारा की राजनीति तय करने वाली टीएमसी महज एक छोटे क्षेत्रीय गुट में सिमट कर रह जाएगी और राष्ट्रीय पटल पर उसका प्रभाव पूरी तरह शून्य हो जाएगा। सोमवार का दिन भारतीय संसदीय इतिहास में तृणमूल के भविष्य और उसके अस्तित्व की नई दिशा तय करने वाला साबित होने जा रहा है।