Please wait
शादी के बंधन में बंधे आमिर खान और गौरी स्प्रैट Sudhir wins historic बंगाल में भारी बारिश का अलर्ट, तटीय जिलों में प्रशासन सतर्क Sudhir wins historic तृणमूल प्रदेश अध्यक्ष पद से इस्तीफे के बाद चंद्रिमा भट्टाचार्य ने ऋतब्रत बनर्जी गुट के नेताओं से की मुलाकात, अटकलें तेज Sudhir wins historic वैभव सूर्यवंशी ने डेब्यू करते ही रचा इतिहास, तोड़ा सचिन तेंदुलकर का 37 साल पुराना महारिकॉर्ड Sudhir wins historic राम मंदिर में चढ़ावा चोरी की घटना दुर्भाग्यपूर्ण, दोषियों को मिले कठोर दंडः संघ Sudhir wins historic डायमंड हार्बर में अभिषेक बनर्जी के खिलाफ नया मामला, ‘सेवाश्रय’ शिविर जांच के घेरे में Sudhir wins historic विपक्षी विधायकों को मिलेगा समान सम्मान और लोकतांत्रिक अधिकार, विधानसभा में बोले मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी Sudhir wins historic तृणमूल के तीन बैंक खातों पर रोक मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट सख्त, बैंक से हलफनामा और पुलिस से जांच रिपोर्ट तलब Sudhir wins historic बंगाल की खाड़ी में बन रहा गहरा निम्न दबाव, चार से आठ जुलाई तक दक्षिण बंगाल में भारी बारिश की चेतावनी Sudhir wins historic विधाननगर अस्पताल का नाम बदला, मुख्यमंत्री ने पूर्ववर्ती सरकार की स्वास्थ्य सेवाओं पर उठाए सवाल Sudhir wins historic

स्टील से ईवी तक : सेल आइएसपी बर्नपुर बनेगा बंगाल के औद्योगिक भविष्य का नया केंद्र

वहीं, हावड़ा ब्रिज और हावड़ा स्टेशन के विस्तार में उनकी भागीदारी ने उन्हें भारतीय औद्योगिक इतिहास में अमर बना दिया

09 Jun 2026

स्टील से ईवी तक : सेल आइएसपी बर्नपुर बनेगा बंगाल के औद्योगिक भविष्य का नया केंद्र

पश्चिम बर्दवान। पश्चिम बंगाल के औद्योगिक इतिहास में एक नया अध्याय लिखे जाने की तैयारी शुरू हो चुकी है। भारी अर्थ-मूविंग मशीनों की गड़गड़ाहट बर्नपुर के उस पुराने औद्योगिक परिदृश्य को बदल रही है, जिसकी नींव प्रथम विश्व युद्ध के अंतिम दौर में वर्ष 1918 में राज्य के पहले एकीकृत इस्पात संयंत्र के रूप में रखी गई थी। अब इस ऐतिहासिक भूमि पर पूर्वी भारत की सबसे बड़ी ग्रीनफील्ड इस्पात विस्तार परियोजना आकार लेने जा रही है, जिसमें दुनिया की सबसे आधुनिक और विशाल ब्लास्ट फर्नेस स्थापित की जाएगी।
यह वही भूमि है जिसकी कल्पना महान उद्योगपति और इंजीनियर सर राजेंद्र नाथ मुखर्जी (राजेन) तथा उनके सहयोगियों ने एक सदी पहले की थी। पुराने कारखानों और जर्जर ढांचों को हटाकर अब नए युग के इस्पात संयंत्रों का निर्माण किया जाएगा। इससे दुर्गापुर-आसनसोल-बर्नपुर औद्योगिक क्षेत्र, जिसे कभी पूर्व का "रूरलैंड" कहा जाता था, को नई आर्थिक ऊर्जा मिलने की उम्मीद है। यह परियोजना पश्चिम बंगाल के लंबे समय से अधूरे पड़े ऑटोमोबाइल हब बनने के सपने को भी नई गति दे सकती है।
आने वाले वर्षों में यहां उच्च गुणवत्ता वाले ऑटोमोबाइल ग्रेड इस्पात का उत्पादन शुरू होने की संभावना है। अनुमान है कि वर्ष 2030 तक भारत का इलेक्ट्रिक वाहन बाजार 1.7 करोड़ यूनिट से अधिक का हो जाएगा। वर्तमान में देश में इलेक्ट्रिक वाहनों के निर्माण संयंत्रों की संख्या सीमित है। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि बर्नपुर में बनने वाला आधुनिक इस्पात संयंत्र इलेक्ट्रिक वाहन और स्पेयर पार्ट्स निर्माताओं को आकर्षित कर सकता है।
सर राजेंद्र नाथ मुखर्जी का जीवन भारतीय औद्योगिक इतिहास की प्रेरणादायक गाथा है। औपनिवेशिक भारत में जब भारतीय उद्यमियों को ब्रिटिश कंपनियों के वर्चस्व वाले क्षेत्रों में अनेक बाधाओं का सामना करना पड़ता था, तब शिवपुर इंजीनियरिंग कॉलेज से शिक्षा प्राप्त मुखर्जी ने 1890 के दशक में ब्रिटिश इंजीनियर थॉमस एक्विन मार्टिन के साथ मिलकर मार्टिन एंड कंपनी की स्थापना की। मार्टिन के निधन के बाद मुखर्जी इसके एकमात्र साझेदार बने और बाद में बर्न एंड कंपनी का अधिग्रहण कर दोनों को मिलाकर मार्टिन एंड बर्न जैसी औद्योगिक दिग्गज कंपनी का निर्माण किया।
जैसे-जैसे उनका निर्माण व्यवसाय बढ़ा, मुखर्जी इस बात को समझने लगे कि औद्योगिक विकास के लिए इस्पात उत्पादन में आत्मनिर्भरता आवश्यक है। इसी सोच के तहत उन्होंने इंडियन आयरन एंड स्टील कंपनी (आईआईएससीओ) की स्थापना की। यह उस समय भारतीय उद्योग जगत के लिए एक साहसिक कदम था। कुछ ही दशकों में आईआईएससीओ की ख्याति इतनी बढ़ गई कि जापान की निप्पॉन स्टील जैसी कंपनियां अपने प्रशिक्षुओं को आधुनिक औद्योगिक तकनीक सीखने के लिए बर्नपुर भेजने लगीं।
आईआईएससीओ के शेयर न केवल मुंबई और कोलकाता स्टॉक एक्सचेंजों में, बल्कि लंदन स्टॉक एक्सचेंज में भी कारोबार करते थे। दो विश्व युद्धों के बीच और उसके बाद कई दशकों तक यह भारत के औद्योगिक विकास का प्रमुख केंद्र बना रहा। बाद में यह स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल) का हिस्सा बन गया।
आईएसपी स्टील प्लांट और दुर्गापुर स्टील प्लांट के प्रभारी निदेशक सुरजीत मिश्रा के अनुसार, स्थापना के एक सदी से अधिक समय बाद भी बर्नपुर औद्योगिक महत्वाकांक्षाओं का केंद्र बना हुआ है। उन्होंने बताया कि सेल द्वारा पश्चिम बंगाल में प्रहजारस्तावित एक लाख करोड़ रुपये के पूंजीगत निवेश में से लगभग 47 करोड़ रुपये आईएसपी और दुर्गापुर स्टील प्लांट के विस्तार एवं आधुनिकीकरण पर खर्च किए जाएंगे।
इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य उच्च गुणवत्ता वाले ऑटोमोबाइल ग्रेड स्टील और विशेष प्लेटों का उत्पादन करना है। इससे ऑटोमोबाइल, मशीन निर्माण, इंजीनियरिंग और स्टील फैब्रिकेशन जैसे उद्योगों के लिए नए अवसर पैदा होंगे। यदि बंगाल सही औद्योगिक रणनीति अपनाता है, तो इलेक्ट्रिक वाहन निर्माता राज्य को अपने उत्पादन केंद्र के रूप में देख सकते हैं। कोलकाता बंदरगाह की उपलब्धता और पूर्वी एशिया के देशों से कच्चा माल तथा पुर्जों की आसान आपूर्ति भी इस दिशा में सहायक साबित हो सकती है।
इंडोर इलेक्ट्रिकल्स की अध्यक्ष रचना आहूजा का कहना है कि इसमें एक ऐतिहासिक समानता दिखाई देती है। जिस प्रकार एक सदी पहले सर राजेंद्र नाथ मुखर्जी ने औद्योगिक विकास के लिए इस्पात, परिवहन और बुनियादी ढांचे को आधार माना था, आज बंगाल फिर से उसी विकास मॉडल की ओर लौटता दिखाई दे रहा है।
राजेंद्र नाथ मुखर्जी का योगदान केवल इस्पात उद्योग तक सीमित नहीं था। मार्टिन एंड बर्न ने उपमहाद्वीप की अनेक प्रतिष्ठित परियोजनाओं के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इनमें विक्टोरिया मेमोरियल, दक्षिणेश्वर मंदिर, बेलूर मठ, टीपू सुल्तान मस्जिद, गार्डन रीच शिपबिल्डर्स, शहीद मीनार और हुगली डॉकयार्ड जैसी ऐतिहासिक संरचनाएं शामिल हैं।
विक्टोरिया मेमोरियल के निर्माण में उनकी कंपनी की उत्कृष्ट कार्यक्षमता से प्रभावित होकर ब्रिटिश प्रशासन ने उन्हें पूरी परियोजना का दायित्व सौंप दिया था। इसी उपलब्धि ने उन्हें 'नाइटहुड' की उपाधि दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वहीं, हावड़ा ब्रिज और हावड़ा स्टेशन के विस्तार में उनकी भागीदारी ने उन्हें भारतीय औद्योगिक इतिहास में अमर बना दिया।
मुखर्जी की दूरदृष्टि परिवहन क्षेत्र में भी दिखाई देती है। औपनिवेशिक रेलवे व्यवस्था की सीमाओं से निराश होकर उन्होंने निजी नैरो-गेज रेलवे नेटवर्क विकसित किया, जिसे मार्टिन रेलवे के नाम से जाना गया। यह नेटवर्क बंगाल, बिहार और उत्तर भारत के अनेक ग्रामीण क्षेत्रों को जोड़ता था। हालांकि, 1980 के दशक में यह सेवा बंद हो गई, लेकिन इसके अवशेष आज भी स्वदेशी औद्योगिक विकास की कहानी बयान करते हैं।
1937 में सर राजेंद्र नाथ मुखर्जी के निधन के बाद उनके पुत्र वीरेन मुखर्जी ने इस औद्योगिक विरासत को आगे बढ़ाया। वर्ष 1953 में उन्होंने आईआईएससीओ के विस्तार के लिए विश्व बैंक से 3.15 करोड़ अमेरिकी डॉलर के ऋण समझौते पर हस्ताक्षर किए। यह पहली बार था जब विश्व बैंक ने किसी निजी औद्योगिक परियोजना को वित्तीय सहायता प्रदान की थी। 1956 में दूसरा समझौता भी हुआ। हालांकि, आईआईएससीओ के विस्तार और आधुनिकीकरण की लगभग तीन-चौथाई लागत कंपनी ने अपने आंतरिक संसाधनों से ही पूरी की थी।
आज बर्नपुर का इस्पात संयंत्र पहले से कहीं अधिक आधुनिक हो चुका है और उसका स्वामित्व निजी हाथों से सार्वजनिक क्षेत्र में आ गया है। लेकिन इसकी मूल भावना वही है जो सर राजेंद्र नाथ मुखर्जी ने एक सदी पहले कहा था कि समृद्धि का निर्माण इस्पात, उद्योग और दूरदर्शी निवेश से होता है।
अब जब बर्नपुर एक नए औद्योगिक युग की ओर बढ़ रहा है, तो यह केवल एक इस्पात संयंत्र का विस्तार नहीं, बल्कि बंगाल के औद्योगिक पुनर्जागरण की नई शुरुआत भी हो सकती है।

Comments

No comments to show. Log in to add some!

Other Relevant Stories


बर्नपुर बनेगा बंगाल के औद्योगिक भविष्य का नया केंद्र
वहीं, हावड़ा ब्रिज और हावड़ा स्टेशन के विस्तार में उनकी भागीदारी ने उन्हें भारतीय औद्योगिक इतिहास में अमर बना दिया





Download The Taaza Tv App Now to Stay Updated on the Latest News!


play store download
app store download
app img


Breaking News