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हाई कोर्ट ने स्पीकर का आदेश मांगा, फिलहाल नेता प्रतिपक्ष बने रहेंगे ऋतब्रत बनर्जी

याचिकाकर्ताओं ने 18 जून से शुरू होने वाले विधानसभा सत्र का हवाला देते हुए अदालत से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की

11 Jun 2026

हाई कोर्ट ने स्पीकर का आदेश मांगा, फिलहाल नेता प्रतिपक्ष बने रहेंगे ऋतब्रत बनर्जी

कोलकाता। पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता फिलहाल ऋतब्रत बनर्जी बने रहेंगे। पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता पद को लेकर जारी राजनीतिक और कानूनी विवाद के बीच कलकत्ता उच्च न्यायालय ने गुरुवार को महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने सवाल उठाया कि क्या विधानसभा अध्यक्ष किसी राजनीतिक दल की सहमति के बिना उसके कथित बागी विधायक को विपक्ष का नेता मान्यता दे सकते हैं, विशेषकर तब जब उसे पार्टी से निष्कासित किया जा चुका हो।
उच्च न्यायालय ने फिलहाल कोई अंतरिम आदेश पारित नहीं किया है। अदालत ने कहा कि पहले विधानसभा अध्यक्ष का आदेश रिकॉर्ड पर लाया जाए, उसके बाद ही मामले के गुण-दोष पर विचार किया जाएगा। मामले की अगली सुनवाई 16 जून को होगी। अदालत की ओर से कोई रोक न लगाए जाने के कारण ऋतब्रत बनर्जी फिलहाल पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता के रूप में बने रहेंगे।
न्यायमूर्ति कृष्ण राव की एकल पीठ गुरुवार काे पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में विधानसभा अध्यक्ष के उस फैसले को चुनौती दी गई है, जिसके तहत ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता और मुख्य सचेतक के रूप में मान्यता दी गई है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य सरकार से पूछा कि क्या विधानसभा अध्यक्ष किसी राजनीतिक दल की सहमति के बिना किसी बागी नेता को विपक्ष का नेता मान्यता दे सकते हैं? जिसे विपक्ष का नेता बनाया गया है, वह अब किसी राजनीतिक दल में नहीं है। उसे पार्टी से निष्कासित किया जा चुका है।
तृणमूल की ओर से दायर याचिका में दावा किया गया है कि 6 मई को पार्टी विधायक दल की बैठक में वरिष्ठ नेता शोभनदेव चट्टोपाध्याय को आधिकारिक तौर पर विपक्ष के नेता पद के लिए चुना गया था। इस संबंध में विधायकों के हस्ताक्षरयुक्त प्रस्ताव विधानसभा अध्यक्ष को भी सौंपा गया था। बावजूद इसके विधानसभा अध्यक्ष ने ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट को मान्यता प्रदान कर दी।
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने अदालत से तत्काल अंतरिम राहत देने की मांग की। उन्होंने तर्क दिया कि संविधान की दसवीं अनुसूची और उच्चतम न्यायालय के विभिन्न फैसले राजनीतिक दल के निर्णय को प्राथमिकता देते हैं, न कि केवल विधायक दल के संख्याबल को।
उन्होंने कहा कि विधानसभा अध्यक्ष को राजनीतिक दल के निर्णय को स्वीकार करना चाहिए, न कि केवल विधायक दल के निर्णय को। यह भी कहा कि यदि राजनीतिक दल और विधायक दल को एक समान मान लिया जाए, तो दल-बदल विरोधी कानून का मूल उद्देश्य प्रभावित होगा।
कल्याण बनर्जी ने बताया कि जिन नेताओं को विपक्ष का नेता और मुख्य सचेतक के रूप में मान्यता दी गई है, उन्हें पहले ही तृणमूल कांग्रेस से निष्कासित किया जा चुका है। उनके निष्कासन को अब तक किसी न्यायिक या संवैधानिक मंच पर चुनौती नहीं दी गई है।
वहीं, राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता बिल्वदल भट्टाचार्य ने अंतरिम राहत का विरोध किया। उन्होंने कहा कि याचिका में आवश्यक तथ्यों और प्रार्थनाओं का अभाव है तथा विधानसभा के रिकॉर्ड और संबंधित आदेश को अदालत के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए समय दिया जाना चाहिए।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति कृष्ण राव ने यह भी जानना चाहा कि विपक्ष के नेता की मान्यता से संबंधित कोई औपचारिक आदेश जारी किया गया है या नहीं। अदालत ने कहा कि यदि ऐसा कोई आदेश पारित हुआ है, तो उसकी प्रति न्यायिक परीक्षण के लिए उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
याचिकाकर्ताओं ने 18 जून से शुरू होने वाले विधानसभा सत्र का हवाला देते हुए अदालत से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की। उनका कहना था कि इस विवाद के कारण सदन में बैठने की व्यवस्था और अन्य संसदीय प्रक्रियाएं प्रभावित हो सकती हैं।

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