Please wait
वैभव सूर्यवंशी का लिस्ट-ए क्रिकेट में सबसे तेज अर्धशतक, महज 29 गेंदों में 94 रन ठोक दिए Sudhir wins historic अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर रेड रोड में भव्य आयोजन, पीएम मोदी बोले - योग मानव चेतना से जुड़ने का जरिया Sudhir wins historic झारखंड राज्यसभा चुनाव: झामुमो के बैद्यनाथ राम और निर्दलीय परिमल नथवानी विजयी Sudhir wins historic फलता हिंसा पर मुख्यमंत्री का सख्त संदेश, बोले- कोई कानून हाथ में न ले, हमलावरों की संपत्ति भी होगी जब्त Sudhir wins historic वरिष्ठ तृणमूल नेता और पूर्व मंत्री उदयन गुहा गिरफ्तार Sudhir wins historic फुटपाथ पर मुड़ी-घुघनी खाते दिखे मंत्री शंकर घोष Sudhir wins historic पारसी फायर टेम्पल से हटेगा अवैध कब्जा Sudhir wins historic ममता बनर्जी को एक और झटका, पूर्व मंत्री मानस भुइयां ने तृणमूल कांग्रेस छोड़ी Sudhir wins historic असम में 18 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों के लिए सीधे आधार नहीं : डॉ. हिमंत बिस्व सरमा Sudhir wins historic असम के जोरहाट में वायु सेना का विमान दुर्घटनाग्रस्त, पांच जवान बलिदान Sudhir wins historic

लहजे से नहीं, लगन से बनती है पहचान : मृणाल ठाकुर

मृणाल ठाकुर उन्हीं में से एक हैं, जिनकी आंखों में सपनों की चमक है और मुस्कान में संघर्ष की कहानी। छोटे पर्दे की सादगी भरी शुरुआत से लेकर बड़े परदे की दमदार मौजूदगी तक, उनका हर कदम जुनून और आत्मविश्वास की मिसाल रहा है।

17 Feb 2026

लहजे से नहीं, लगन से बनती है पहचान : मृणाल ठाकुर

रोशनी से भरे इस दौर में कुछ चेहरे ऐसे होते हैं, जो सिर्फ पर्दे पर नहीं, दिलों में बस जाते हैं। मृणाल ठाकुर उन्हीं में से एक हैं, जिनकी आंखों में सपनों की चमक है और मुस्कान में संघर्ष की कहानी। छोटे पर्दे की सादगी भरी शुरुआत से लेकर बड़े परदे की दमदार मौजूदगी तक, उनका हर कदम जुनून और आत्मविश्वास की मिसाल रहा है।

टीवी शो 'मुझसे कुछ कहती... ये खामोशियां' और 'कुमकुम भाग्य' से पहचान बनाने वाली मृणाल ने जब फिल्मों की दुनिया में कदम रखा, तो संवेदनशील फिल्म 'लव सोनिया' से अपने अभिनय की गहराई का एहसास कराया। इसके बाद 'सुपर 30', 'बटला हाउस', 'तूफान' और 'जर्सी' में उनकी मौजूदगी ने साबित किया कि वह सिर्फ एक अभिनेत्री नहीं, बल्कि हर किरदार को जीने वाली कलाकार हैं। साउथ सिनेमा में 'सीता रामम' और हाय नन्ना ने उन्हें पैन-इंडिया पहचान दिलाई। अब प्यार के इस खास मौसम में वह अपनी नई फिल्म 'दो दीवाने सहर में' के जरिए एक बार फिर भावनाओं की नई दास्तां लेकर आ रही हैं। 20 फरवरी 2026 को रिलीज हो रही इस फिल्म के मौके पर उन्होंने 'हिन्दुस्थान समाचार' से अपने सफर, संघर्ष और सपनों पर दिल खोलकर बात की।

सवाल : फिल्म के टाइटल में 'सहर' शब्द का क्या अर्थ है?

मृणाल ठाकुर : उन्होंने कहा, 'सहर' का मतलब होता है भोर, अंधेरे को चीरती हुई रोशनी की पहली किरण। इस शब्द में एक सादगी है, एक देसीपन है, जो हमारी कहानी की आत्मा से जुड़ता है। इसमें उम्मीद है, नई शुरुआत है और एक कोमल भावनात्मक स्पर्श भी। पुराने गीत 'दो दीवाने शहर में' से जो शहर, सपनों और प्रेम का एहसास जुड़ा है, वही संवेदना हमारे टाइटल में भी छिपी है। बस हमने उसे थोड़ा अपना रंग दिया है। दिलचस्प बात यह है कि इस टाइटल का सुझाव संजय लीला भंसाली सर ने दिया था। इसके पीछे एक खूबसूरत सोच भी है। फिल्म में शशांक 'श' का सही उच्चारण नहीं कर पाता और 'शहर' की जगह 'सहर' बोलता है। यह केवल एक उच्चारण की गलती नहीं, बल्कि कहानी का एक मासूम और प्यारा पहलू है। इस तरह 'सहर' सिर्फ एक शहर का नाम नहीं, बल्कि नई सुबह, उम्मीद और प्रेम की शुरुआत का प्रतीक बन जाता है।

सवाल : करियर की शुरुआत में क्या आपको रास्ता अनिश्चित या जोखिम भरा लगा? उस दौर में आपने खुद को कैसे संभाला?

मृणाल ठाकुर : हाँ, बिल्कुल। बचपन से ही मेरे भीतर एक झिझक थी। कई बार क्लास में जवाब पता होने के बावजूद मैं हाथ उठाने की हिम्मत नहीं जुटा पाती थी। मुझे अपनी अंग्रेज़ी को लेकर हीन भावना होती थी, क्योंकि उसमें मराठी लहजा साफ झलकता था। इतना ही नहीं, मेरा नाम 'मृणाल' लड़कों जैसा लगता है, इस वजह से स्कूल में बच्चे मुझे चिढ़ाते भी थे। फिल्म इंडस्ट्री में आने के बाद भी यह असुरक्षा मेरे साथ रही। मुझे लगता था कि मुझे और धाराप्रवाह अंग्रेज़ी बोलनी चाहिए, मेरे उच्चारण में मराठी लहजा कम होना चाहिए। लेकिन समय के साथ समझ आया कि हमारी असुरक्षाएँ तभी बड़ी बनती हैं, जब हम उन्हें खुद बड़ा बना देते हैं। आज मैं अपने व्यक्तित्व और अपनी जड़ों के साथ पूरी तरह सहज और संतुष्ट हूँ। जहां तक फिल्म 'दो दीवाने सहर में' की बात है, इसमें मेरा किरदार 'रोशनी' मेरे व्यक्तित्व का करीब साठ प्रतिशत हिस्सा दर्शाता है। बाकी चालीस प्रतिशत उसकी अपनी यात्रा और रचनात्मक निर्माण से आता है। यह कहानी दो लोगों के एक-दूसरे की कमियों को समझने, स्वीकारने और उन्हें खूबसूरती में बदल देने की है। हमने एक नरम, सादगी भरी प्रेम कहानी पेश करने की कोशिश की है, ऐसी कहानी जो आज के सोशल मीडिया के शोर में खोती जा रही सच्ची भावनाओं को फिर से जगाने का एक ईमानदार प्रयास है।

सवाल : ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री के पीछे ऑफ-स्क्रीन बॉन्डिंग कितनी अहम रही?

मृणाल ठाकुर : हमारा रिश्ता सिर्फ को-एक्टर्स वाला नहीं रहा, बल्कि सच में दोस्ती में बदल गया। हम एक-दूसरे की परवाह करते हैं, कभी हल्की-फुल्की नोकझोंक भी हो जाती है, मज़ाक-मस्ती भी होती है, लेकिन अंत में दिल से जुड़े रहते हैं। मेरे लिए सबसे खास बात उनकी काम के प्रति ईमानदारी है। मैंने कई कलाकारों को लोकप्रियता की चकाचौंध में खोते देखा है, लेकिन सिद्धांत जमीन से जुड़े इंसान हैं। सेट पर उनकी सादगी और फोकस साफ नजर आता था। वह हमेशा कुछ नया करने की कोशिश करते हैं, ताकि दर्शक सिर्फ किरदार ही नहीं, बल्कि उनके भीतर की सच्चाई भी महसूस कर सकें। ऐसे समर्पित सह-कलाकार के साथ काम करना किसी सौभाग्य से कम नहीं। पूरा अनुभव बेहद यादगार रहा। शूट के दौरान हमने मुंबई को साथ जिया, मैं उन्हें स्कूटर पर कॉलेज तक ले जाती थी, ठीक वैसे ही जैसे फिल्म में दिखाया गया है। छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस से चर्चगेट तक का सफर, के.सी. कॉलेज का कैंपस और एशियाटिक लाइब्रेरी की सीढ़ियों पर फिल्माया गया क्लाइमेक्स, ये सब मेरे लिए बेहद खास रहा। मुंबई मेरे लिए सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि घर जैसा एहसास है। कुछ दिनों के लिए बाहर जाऊं तो भी मन यहीं लौटने को बेताब रहता है।

सवाल : आपने हिंदी और साउथ फिल्म इंडस्ट्री में काम किया है। काम करने के तरीके में क्या अंतर महसूस हुआ?

मृणाल ठाकुर : मेरे अनुभव में सबसे बड़ा अंतर भाषा का है। बाकी जहां तक मेहनत, प्रोफेशनलिज़्म और समर्पण की बात है, वो दोनों इंडस्ट्री में समान है। संस्कृति और खान-पान बदल जाता है, यहां वड़ापाव और कंदा-पोहा, तो वहां इडली-वड़ा और सांभर, लेकिन काम के प्रति जुनून हर जगह एक जैसा है। मुंबई में अक्सर शूटिंग का शेड्यूल काफी टाइट और दबाव भरा होता है। उदाहरण के तौर पर, हमने अपनी एक फिल्म सिर्फ 38 दिनों में पूरी की, जबकि 'डकैत' की शूटिंग में करीब 75 दिन लगे और उससे पहले की एक फिल्म को लगभग 120 दिन मिले। इसलिए स्पीड, प्लानिंग और वर्किंग स्टाइल निर्देशक और प्रोडक्शन पर निर्भर करता है। आखिर में, दोनों इंडस्ट्री की असली ताकत उनके दर्शक हैं। हिंदी हो या साउथ सिनेमा, मुझे हर जगह से भरपूर प्यार मिला है। एक कलाकार के लिए इससे बड़ी खुशी क्या हो सकती है।

सवाल : क्या आपके 'लुक' को लेकर कभी कोई अलग अनुभव रहा है?

मृणाल ठाकुर : जी हां, मेरे साथ ऐसा हुआ है। मेरी पहली फिल्म 'लव सोनिया' के दौरान मेरा ऑडिशन एक ऐसे फोल्डर में रखा गया था जिस पर लिखा था 'खोलना मना है।' लेकिन निर्देशक तबरेज नूरानी ने वह फाइल खोली, ऑडिशन देखा और मुझसे मुलाकात की। बातचीत के बाद उन्हें भरोसा हुआ कि मैं 'सोनिया: का किरदार निभा सकती हूं। यह किरदार एक गांव की साधारण लड़की का था, इसलिए मुझे टीम को समझाना पड़ा कि सादगी वाला लुक मेकअप और तकनीक से हासिल किया जा सकता है। लोग अक्सर सोचते हैं कि खूबसूरती और सफलता सब कुछ आसान बना देती है, लेकिन सच्चाई यह है कि हर किसी का अपना संघर्ष होता है। शोहरत के पीछे भी कई त्याग छिपे होते हैं।
 

Ad Image
Comments

No comments to show. Log in to add some!

Other Relevant Stories


लहजे से नहीं, लगन से बनती है पहचान : मृणाल ठाकुर
मृणाल ठाकुर उन्हीं में से एक हैं, जिनकी आंखों में सपनों की चमक है और मुस्कान में संघर्ष की कहानी। छोटे पर्दे की सादगी भरी शुरुआत से लेकर बड़े परदे की दमदार मौजू





Download The Taaza Tv App Now to Stay Updated on the Latest News!


play store download
app store download
app img


Breaking News