अनिच्छुक किसानों ने बीडीओ से की लिखित शिकायत
कोलकाता। इतिहास की घडिय़ों ने जैसे सिंगूर में खुद को दोहराना शुरू कर दिया है। करीब साढ़े 17 साल पहले जिस टाटा मैदान से नैनो कारखाने की विदाई हुई थी, वही मैदान एक बार फिर विवादों के केंद्र में है। आगामी 18 जनवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रस्तावित जनसभा के लिए तैयार हो रहे मंच के बीच कुछ स्थानीय किसानों ने बिना अनुमति जमीन इस्तेमाल करने का आरोप लगाकर सनसनी फैला दी है। किसानों ने सिंगूर के खंड विकास अधिकारी यानी बीडीओ को पत्र लिखकर अपना कड़ा विरोध दर्ज कराया है।
सिंहेर बेड़ी और गोपालनगर मौजा के कुछ जमीन मालिकों ने बीडीओ को सौंपे अपने शिकायती पत्र में दाग नंबर और खतियान के साथ विवरण देते हुए आरोप लगाया है कि प्रधानमंत्री की सभा के लिए उनकी कृषि भूमि का उपयोग किया जा रहा है, लेकिन इसके लिए उनसे न तो मौखिक और न ही लिखित अनुमति ली गई। किसानों ने साफ कहा है कि भूमि स्वामी होने के नाते उनकी अनदेखी नियमों का उल्लंघन है। संयोग देखिए कि जिस जमीन पर कभी रतन टाटा का ड्रीम प्रोजेक्ट नैनो आकार लेने वाला था, वहीं प्रधानमंत्री मोदी के लिए विशाल हैंगर नुमा मंच तैयार किया गया है। लोहे के खंभों और सफेद तिरपाल से ढकी यह संरचना ठीक वैसी ही नजर आ रही है जैसी कभी प्रस्तावित फैक्ट्री की छत हुआ करती थी। 18 जनवरी की इस सभा को लेकर भाजपा ने पूरी ताकत झोंक दी है, लेकिन ऐन वक्त पर उठे इस विवाद ने प्रशासनिक हलकों में बेचैनी बढ़ा दी है। इस मुद्दे पर सिंगूर से एक बार फिर आंदोलन की सुगबुगाहट तेज हो गई है। राज्य के मंत्री और तृणमूल विधायक बेचाराम मन्ना ने कहा कि बिना किसानों की अनुमति के सभा करना पूरी तरह गलत है। भाजपा नियमों की धज्जियां उड़ा रही है। वही पटलवार करते हुए भाजपा नेता जगन्नाथ चट्टोपाध्याय ने कहा कि यह निचले स्तर की राजनीति है। सभा के लिए जिला प्रशासन से विधिवत अनुमति ली गई है और एसपीजी की सुरक्षा बैठक भी हो चुकी है। यह एक सरकारी और गरिमामय कार्यक्रम है।
अक्टूबर 2008 में जब ममता बनर्जी के भूमि आंदोलन के कारण रतन टाटा ने सिंगूर छोडऩे का फैसला किया था, तब उन्होंने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का हाथ थामा था। टाटा ने तब ममता बनर्जी और नरेंद्र मोदी की तुलना करते हुए गुड एम और बैड एम का चर्चित जुमला दिया था। आज वही गुड एम यानी नरेंद्र मोदी बतौर प्रधानमंत्री उसी मैदान पर खड़े होकर बंगाल की जनता को संबोधित करेंगे। सिंगूर की राजनीति हमेशा से जमीन के इर्द-गिर्द घूमती रही है। प्रधानमंत्री की सभा से ठीक पहले किसानों की यह शिकायत क्या किसी नए आंदोलन की आहट है या केवल चुनावी राजनीति का हिस्सा? 17 और 18 जनवरी को प्रधानमंत्री की मालदा और सिंगूर की सभाओं से बंगाल की सियासत का पारा और चढऩा तय है।