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अब 'फटाफट' मोड में 'खेला होबे'
कोलकाता। अब सिर्फ खेला नहीं, फटाफट खेला होगा। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का यह नया नारा बुधवार को देश की सर्वोच्च अदालत के गलियारों में उस समय हकीकत बनता दिखा, जब उन्होंने खुद एक वकील की भूमिका में चुनाव आयोग के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। बंगाल में मतदाता सूची के एसआईआर के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में ममता की व्यक्तिगत मौजूदगी और उनकी धारदार दलीलों ने न केवल कानूनी बल्कि राजनीतिक गलियारों में भी उबाल ला दिया है। तृणमूल इसे अपनी एक बड़ी नैतिक और रणनीतिक जीत के रूप में देख रही है। बुधवार को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम। पंचोली की पीठ के समक्ष ममता बनर्जी ने भावुक और तर्कसंगत अंदाज में बंगाल का पक्ष रखा। उन्होंने आयोग पर विपक्ष शासित राज्यों को निशाना बनाने का आरोप लगाते हुए कहा कि जिस प्रक्रिया में दो साल लगने चाहिए, उसे तीन महीने में समेटा जा रहा है। ममता ने अदालत को बताया कि बंगाल में 58 लाख नाम हटा दिए गए हैं और जीवित लोगों को कागजों पर मृत घोषित कर दिया गया है। उनकी इन दलीलों का असर यह हुआ कि सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को नोटिस जारी करते हुए अधिकारियों को अधिक संवेदनशील होने और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा करने का कड़ा निर्देश दिया। तृणमूल खेमे के लिए यह घटनाक्रम किसी संजीवनी से कम नहीं है।
पार्टी का मानना है कि ममता की इस पहल से संगठन के भीतर छाई जड़ता टूट गई है। शुभेंदु अधिकारी की चेतावनियों से जो निचले स्तर के कार्यकर्ता संशय में थे, वे अब फिर से सड़क की लड़ाई के लिए तैयार दिख रहे हैं। राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर राय और कल्याण बनर्जी जैसे नेताओं ने इसे ऐतिहासिक क्षण बताते हुए कहा कि ममता दी ने साबित कर दिया है कि वे केवल बंगाल की नेता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के खिलाफ सबसे मुखर चेहरा हैं।
पार्टी का दावा है कि इस कदम से अल्पसंख्यक समुदाय और उन गरीब मतदाताओं में भरोसा बढ़ा है, जिन्हें नाम कटने का डर सता रहा था। दिलचस्प बात यह है कि ममता के इस कदम ने विपक्षी एकता में भी नई लकीर खींच दी है। जहां कांग्रेस और वाम दल इस पर बंटे हुए नजर आए, वहीं तृणमूल इसे 2026 के विधानसभा चुनाव के लिए एक मास्टरस्ट्रोक मान रही है। सोमवार, 9 फरवरी को इस मामले की अगली सुनवाई होनी है। यद्यपि ममता का दोबारा जाना अभी तय नहीं है, लेकिन तृणमूल नेताओं का स्पष्ट कहना है कि ममता दिल्ली गईं नहीं, बल्कि दिल्ली पर छा गईं। इस अदालती संघर्ष ने बंगाल की चुनावी बिसात पर खेला को एक नए और आक्रामक मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है।