टीएमसी सांसद कल्याण बनर्जी मानसून सत्र की शेष अवधि के लिए निलंबित
इसके विपरीत, मेयो रोड स्थित ऋतब्रत बनर्जी समर्थक बागी गुट के मंच पर शुरुआती घंटों में भीड़ का नितांत अभाव दिखाई दिया
कोलकाता। बंगाल की राजनीति में ऐतिहासिक 21 जुलाई शहीद दिवस के अवसर पर पहली बार तृणमूल के भीतर का गुटबाज़ी और शक्ति प्रदर्शन दो अलग-अलग मंचों के जरिए पूरी दुनिया के सामने आ गया। एक ओर कोलकाता के बिरला तारामंडल के सामने तृणमूल प्रमुख ममता बनर्जी का मुख्य कार्यक्रम था, तो वहीं दूसरी ओर मेयो रोड स्थित गांधी प्रतिमा के पास ऋतब्रत बनर्जी समर्थक गुट ने एक समानांतर सभा का आयोजन किया। पूरे दिन राजनीतिक विश्लेषकों, मीडिया और आम जनता की नजरें इसी बात पर टिकी रहीं कि आखिर तृणमूल का जमीनी कार्यकर्ता किस खेमे के साथ खड़ा नजर आता है।
सुबह से ही बिरला तारामंडल की ओर जाने वाले तमाम मार्गों पर कार्यकर्ताओं का जनसैलाब उमडऩा शुरू हो गया था। संकरी सड़कों पर कार्यकर्ताओं का हुजूम इस कदर बढ़ा कि साढ़े दस बजे तक पूरा इलाका खचाखच भर गया। ट्रेन, बस और मेट्रो के जरिए पहुँचे कार्यकर्ताओं ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उनके लिए तृणमूल कांग्रेस का मतलब केवल दीदी हैं और वे किसी भी हाल में केवल ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले मंच पर ही निष्ठा रखेंगे। कार्यकर्ताओं ने यह संदेश साफ दिया कि राजनीतिक परिस्थितियाँ भले ही बदल जाएँ, लेकिन ममता बनर्जी के प्रति उनका भरोसा और पुरानी स्मृतियाँ आज भी अडिग हैं।
इसके विपरीत, मेयो रोड स्थित ऋतब्रत बनर्जी समर्थक बागी गुट के मंच पर शुरुआती घंटों में भीड़ का नितांत अभाव दिखाई दिया। सुबह के समय वहाँ गिनी-चुनी संख्या में ही लोग मौजूद थे और सभा स्थल की अधिकांश कुर्सियाँ खाली पड़ी रहीं। हालांकि समय बीतने के साथ मंच पर चंद्रिमा भट्टाचार्य, अरूप राय, मदन मित्र, फिरहाद हाकिम, अनुब्रत मंडल और स्नेहाशीष चक्रवर्ती जैसे बड़े-बड़े चेहरे जुटते गए, लेकिन इसके बावजूद दोपहर तक मैदान में अपेक्षित जनसमूह नहीं जुट सका। इस फीके जमावड़े पर जब ऋतब्रत बनर्जी से सवाल किया गया, तो उन्होंने सफाई देते हुए कहा कि संकरी जगह होने के कारण ममता बनर्जी के कार्यक्रम में भीड़ ज्यादा दिखाई दे रही है।
दिनभर चले इस अभूतपूर्व सियासी ड्रामे में मेयो रोड के मंच से अभिषेक बनर्जी और पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर तीखे जुबानी हमले बोले गए, लेकिन जनभागीदारी के मोर्चे पर परिणाम पूरी तरह एकतरफा दिखाई दिया। जहाँ एक तरफ ममता बनर्जी की सभा में लगातार कार्यकर्ताओं का सैलाब उमड़ता रहा, वहीं बागी गुट की सभा फीकी साबित हुई। 21 जुलाई का यह आयोजन केवल शहीद दिवस का स्मरण बनकर नहीं रहा, बल्कि तृणमूल के भीतर जारी वर्चस्व की जंग का खुला प्रदर्शन बन गया। दिन के अंत में भीड़ की मौजूदगी ने यह साफ संकेत दे दिया कि पार्टी की असली ताकत और जमीनी आधार आज भी ममता बनर्जी के साथ ही मुस्तैदी से खड़ा है।