आरजी कर हादसा : क्यों बेकाबू हुई लिफ्ट, फॉरेंसिक टीम ने जुटाए सुराग
कोलकाता। आरजी कर मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल के ट्रॉमा केयर भवन में हुई एक रूहानी और दर्दनाक घटना ने पूरे स्वास्थ्य महकमे और अस्पताल प्रशासन की सुरक्षा व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर दिया है। शनिवार को फॉरेंसिक विशेषज्ञों की टीम ने घटनास्थल का दौरा कर बेसमेंट और लिफ्ट से महत्वपूर्ण नमूने एकत्र किए, ताकि यह गुत्थी सुलझाई जा सके कि आखिर एक आधुनिक ट्रॉमा केयर सेंटर की लिफ्ट अचानक डेथ ट्रैप कैसे बन गई। जांच का मुख्य केंद्र यह है कि क्या यह हादसा किसी बड़ी तकनीकी विफलता का परिणाम था, गलत बटन दबाने जैसी मानवीय चूक थी, या फिर लंबे समय से मेंटेनेंस की अनदेखी का नतीजा। इस हृदयविदारक घटना में अरूप बंद्योपाध्याय नामक व्यक्ति की जान चली गई, जो अपने तीन वर्षीय मासूम बच्चे के इलाज के लिए अस्पताल आए थे।
प्रत्यक्षदर्शियों और परिवार के अनुसार, अरूप अपनी पत्नी और बच्चे के साथ लिफ्ट में सवार थे, जब लिफ्ट अचानक अनियंत्रित होकर ऊपर-नीचे होने लगी। बेसमेंट में दरवाजा खुलने पर उनकी पत्नी और बच्चा तो बाहर निकलने में सफल रहे, लेकिन इससे पहले कि अरूप कदम बाहर रखते, लिफ्ट का दरवाजा बंद हो गया और वह बीच में ही फंस गए। अनियंत्रित लिफ्ट के खिंचाव और दबाव के कारण अरूप गंभीर रूप से चोटिल हो गए। पोस्टमार्टम की शुरुआती रिपोर्ट रोंगटे खड़े करने वाली है, जिसमें उनके हाथ-पैर और पसलियां टूटने के साथ-साथ दिल, फेफड़े और लिवर के फटने की पुष्टि हुई है। परिवार का सबसे गंभीर आरोप अस्पताल की आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली पर है।
उनका कहना है कि अरूप करीब डेढ़ से दो घंटे तक लिफ्ट और बेसमेंट के बीच फंसे रहे और मदद के लिए चीखते रहे, लेकिन वहां मौजूद लोहे के ग्रिल गेट पर ताला लगा होने के कारण कोई उन तक नहीं पहुँच सका। समय रहते यदि उस ताले को तोड़ दिया जाता, तो शायद अरूप आज जीवित होते। इस आपराधिक लापरवाही के आरोप में टाला थाना पुलिस ने तीन लिफ्टमैन—मिलन कुमार दास, विश्वनाथ दास, मानस कुमार गुहा—और दो सुरक्षा गार्डों को गिरफ्तार किया है। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए जांच अब कोलकाता पुलिस के होमिसाइड विभाग (लालबाजार) को सौंप दी गई है, जो इस बात की तहकीकात कर रहे हैं कि हादसे के वक्त ड्यूटी पर तैनात कर्मचारी अपनी जगह से नदारद क्यों थे। रविवार को फॉरेंसिक विभाग की एक और टीम गहन जांच के लिए अस्पताल पहुँचेगी, जबकि अस्पताल प्रशासन आंतरिक बैठकों के जरिए अपनी रिपोर्ट स्वास्थ्य विभाग को सौंपने की तैयारी कर रहा है। यह हादसा केवल एक तकनीकी विफलता नहीं है, बल्कि यह उन हजारों मरीजों और उनके परिजनों की सुरक्षा पर एक बड़ा सवालिया निशान है जो हर दिन इन सरकारी अस्पतालों पर भरोसा करते हैं। अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या इस मौत के लिए जिम्मेदार सिस्टम के बड़े अधिकारियों पर भी कोई कार्रवाई होगी या मामला केवल छोटे कर्मचारियों की गिरफ्तारी तक ही सीमित रह जाएगा।