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चुनाव आयोग को बताया 'अक्षम', लोकतंत्र बचाने के लिए कानूनी जंग का ऐलान
कोलकाता। बंगाल विधानसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा के तुरंत बाद माकपा के राज्य सचिव मोहम्मद सलीम ने निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता और मतदाता सूची की शुद्धता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। रविवार को चुनाव कार्यक्रम जारी होने के बाद संवाददाताओं को संबोधित करते हुए सलीम ने डी-वोटर और विचाराधीन श्रेणी में रखे गए लाखों मतदाताओं की स्थिति को असंवैधानिक करार दिया। उन्होंने चेतावनी दी कि माकपा इस मुद्दे को केवल राजनीतिक मंचों तक सीमित नहीं रखेगी, बल्कि जरूरत पडऩे पर निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक कानूनी लड़ाई लड़ी जाएगी। सलीम ने दोटूक शब्दों में कहा कि कोई व्यक्ति या तो भारत का मतदाता होता है या नहीं, लेकिन उसे विचाराधीन रखकर लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित करना कानून के खिलाफ है।
सलीम ने आयोग पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर हेरफेर भाजपा और आरएसएस की इच्छा के अनुरूप किया गया है। उनके अनुसार, पहले मैपिंग के नाम पर भ्रम फैलाया गया और जब लोगों ने अपनी पहचान साबित कर दी, तब भी विभिन्न तकनीकी बहानों से उन्हें सूची से बाहर रखने या लंबित रखने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने इस प्रक्रिया को शरणार्थियों, मतुआ समुदाय, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों और युवा मतदाताओं के खिलाफ एक साजिश करार दिया। सलीम ने केंद्र और राज्य सरकार दोनों को इस विफलता के लिए जिम्मेदार ठहराया और कहा कि बीडीओ से लेकर जिलाधिकारी कार्यालयों तक का रवैया पक्षपातपूर्ण रहा है। निर्वाचन आयोग की विश्वसनीयता पर प्रहार करते हुए माकपा नेता ने सवाल उठाया कि जो संस्था एक पारदर्शी और सही मतदाता सूची तैयार नहीं कर सकती, वह स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कैसे कराएगी।
उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ विशेष क्षेत्रों और समुदायों को निशाना बनाकर मतदाता सूची में बदलाव किए गए हैं ताकि चुनाव परिणामों को समय से पहले प्रभावित किया जा सके। सलीम ने स्पष्ट किया कि जब कार्यपालिका अपने कर्तव्यों में विफल हो जाती है, तो न्यायपालिका ही अंतिम सहारा बचती है। उन्होंने लोकतंत्र और मानवाधिकारों में विश्वास रखने वाले वकीलों और संगठनों से इस लड़ाई में साथ आने की अपील की है। अंत में सलीम ने हुंकार भरते हुए कहा कि माकपा हर वास्तविक मतदाता के वोट देने के अधिकार की रक्षा के लिए अंत तक पीछा करेगी। चुनाव की घोषणा के साथ ही मोहम्मद सलीम के इस कड़े रुख ने स्पष्ट कर दिया है कि आगामी दो चरणों के मतदान के दौरान मतदाता सूची का मुद्दा न केवल एक बड़ा राजनीतिक हथियार बनेगा, बल्कि यह अदालती गलियारों में भी राज्य सरकार और चुनाव आयोग के लिए बड़ी चुनौती पेश करेगा।