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शक्तिपीठ बर्गभीमा मंदिर में थमेगा मां का भोग

मंदिर प्रशासन ने गैस की भारी किल्लत और बुकिंग में आ रही बाधाओं को इस कठोर निर्णय का मुख्य कारण बताया है

11 Mar 2026

शक्तिपीठ बर्गभीमा मंदिर में थमेगा मां का भोग

कोलकाता। बंगाल में रसोई गैस (एलपीजी) की अभूतपूर्व किल्लत का प्रभाव अब केवल घरों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने आस्था के केंद्रों को भी अपनी चपेट में ले लिया है। पूर्वी मेदिनीपुर जिले के तमलुक स्थित ऐतिहासिक बर्गभीमा मंदिर जो सती के 51 शक्तिपीठों में से एक है जिसमें आगामी 21 मार्च से श्रद्धालुओं के लिए मां का प्रसाद (भोग) वितरण अनिश्चितकाल के लिए बंद करने का निर्णय लिया गया है। मंदिर प्रशासन ने गैस की भारी किल्लत और बुकिंग में आ रही बाधाओं को इस कठोर निर्णय का मुख्य कारण बताया है। 
मंदिर सूत्रों के अनुसार, प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु मां के दर्शन और भोग ग्रहण करने दूर-दराज से यहाँ आते हैं। मंदिर की रसोई में भारी मात्रा में भोग तैयार करने के लिए व्यावसायिक गैस सिलेंडरों की आवश्यकता होती है, जिनकी आपूर्ति वर्तमान में लगभग ठप हो गई है। मंदिर अधिकारियों ने बताया कि जिन भक्तों ने पहले ही भोग के लिए अग्रिम बुकिंग करा ली थी, उन्हें फोन कर इस संकट की जानकारी दी जा रही है और असुविधा के लिए खेद व्यक्त किया जा रहा है। हालांकि, देवी की दैनिक नित्य पूजा और सांकेतिक भोग की परंपरा सीमित संसाधनों के साथ जारी रहेगी, लेकिन आम श्रद्धालुओं के लिए सामूहिक वितरण संभव नहीं हो पाएगा। श्रद्धालुओं में इस निर्णय को लेकर गहरी निराशा है। तमलुक पहुँचे एक भक्त मित्थू कांदर ने व्यथा व्यक्त करते हुए कहा कि हम माँ का आशीर्वाद और भोग पाने की आस में यहाँ आते हैं, लेकिन अब गैस की कमी के कारण यह सेवा बंद होना बेहद दुखद है। सरकार को जल्द से जल्द मंदिरों और ऐसे धार्मिक स्थलों के लिए गैस की सुचारू आपूर्ति सुनिश्चित करनी चाहिए। उल्लेखनीय है कि यह संकट केवल तमलुक तक सीमित नहीं है। इससे पूर्व कोलकाता के बागबाजार स्थित मां का घर में भी बीते 3 मार्च से प्रसाद वितरण सेवा को गैस की अनुपलब्धता के कारण स्थगित करना पड़ा था। मध्य पूर्व के युद्ध के चलते व्यावसायिक गैस सिलेंडरों (19 किलो व 47.5 किलो) की जो कमी पैदा हुई है, उसका सीधा असर अब समाज के हर वर्ग पर पड़ रहा है। जहाँ एक ओर होटल और कैटरिंग व्यवसाय बंदी की कगार पर हैं, वहीं दूसरी ओर मंदिरों में सदियों से चली आ रही भोग वितरण की परंपरा का रुकना प्रदेश के लिए एक गंभीर चिंता का विषय बन गया है।

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