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चुनावी कुरुक्षेत्र से पीछे हट सकते हैं मो. सलीम
कोलकाता। विधानसभा चुनाव की आहट के बीच वामपंथी राजनीति के गलियारों से एक चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है। माकपा के कद्दावर नेता और राज्य सचिव मोहम्मद सलीम इस बार चुनावी मैदान में उतरने के बजाय खुद को पीछे खींच सकते हैं। पार्टी के भीतर गहराते दबाव और रणनीतिक बदलावों के बीच यह चर्चा तेज है कि सलीम इस बार उम्मीदवार बनने के बजाय पूरे राज्य में पार्टी के चुनाव प्रचार की कमान संभालेंगे। उनके साथ ही वरिष्ठ नेता सुजन चक्रवर्ती के चुनाव लडऩे पर भी सस्पेंस बरकरार है, जिससे बंगाल की वामपंथी राजनीति में नेतृत्व की नई बिसात बिछती नजर आ रही है।
पार्टी सूत्रों के अनुसार, बुधवार को हुई राज्य सचिवमंडल की बैठक में उम्मीदवारों के चयन को लेकर गहन मंथन हुआ। माना जा रहा है कि मोहम्मद सलीम पर चुनाव न लडऩे का दबाव दो वजहों से है— पहला, पार्टी का एक बड़ा वर्ग उन्हें स्टार प्रचारक के रूप में पूरे बंगाल में घूमते देखना चाहता है, और दूसरा, मुर्शिदाबाद सीट को लेकर उपजे आंतरिक विवाद और गठबंधन की विफलताओं ने उनकी राह कठिन कर दी है। कांग्रेस के साथ सीटों का तालमेल न हो पाना और हुमायूं कबीर के साथ कथित संपर्कों को लेकर हुई आलोचना ने सलीम को रक्षात्मक मुद्रा में ला खड़ा किया है। वहीं, सुजन चक्रवर्ती ने भी चुनावी मैदान में उतरने के बजाय संगठन और प्रचार की जिम्मेदारी संभालने में अधिक रुचि दिखाई है। पार्टी अब युवा चेहरों पर दांव लगाने की तैयारी में है। उत्तरपाड़ा से मीनाक्षी मुखर्जी का नाम लगभग तय माना जा रहा है, जबकि पलाश दास और आभास राय चौधरी जैसे नेताओं को चुनावी रण में उतारने के संकेत मिले हैं। हालांकि, वाम मोर्चे के भीतर सीटों का गणित अब भी उलझा हुआ है। आईएसएफ के साथ उत्तर और दक्षिण 24 परगना की सीटों पर तनातनी बरकरार है, तो वहीं फॉरवर्ड ब्लॉक, आरएसपी और सीपीआई जैसे सहयोगी दल भी अपनी मांगों पर अड़े हुए हैं। 16 और 17 मार्च को होने वाली वाम मोर्चे की निर्णायक बैठक में ही यह साफ हो पाएगा कि 'लाल झंडे' की इस लड़ाई में सेनापति खुद मैदान में उतरेंगे या केवल पीछे से कमान संभालेंगे।