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समर्पण के रहस्य का सही जवाब अभिषेक ही दे सकते हैं: कुणाल

'पुष्पा झुकेगा नहीं कहा था, तो फिर झुका क्यों?'

19 May 2026

समर्पण के रहस्य का सही जवाब अभिषेक ही दे सकते हैं: कुणाल

कोलकाता। फलता विधानसभा उपचुनाव के ठीक दो दिन पहले तृणमूल के भीतर एक बहुत बड़ा राजनीतिक भूचाल आ गया है। पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार जाहांगीर खान ने अचानक चुनावी मैदान से हटने का सनसनीखेज ऐलान कर दिया है, जिसके तुरंत बाद टीएमसी के कद्दावर नेता और विधायक कुणाल घोष ने अपनी ही पार्टी के आंतरिक हालात पर बेहद तीखा और विस्फोटक हमला बोल दिया है। आगामी 21 मई को होने वाले मतदान से ऐन पहले मंगलवार को जाहांगीर खान ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई और चुनाव न लडऩे की घोषणा करके सबको चौंका दिया। इस घोषणा से भी ज्यादा हैरान करने वाली बात यह रही कि मैदान छोडऩे से ठीक पहले जाहांगीर खान ने राज्य के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की खुलकर और जमकर तारीफ की। इस अप्रत्याशित घटनाक्रम ने तृणमूल के शीर्ष नेतृत्व को गहरे झटके में डाल दिया है और इसी के बाद कुणाल घोष के बयानों ने पार्टी के भीतर मचे आंतरिक अविश्वास और संकट को सरेआम उजागर कर दिया है। 
जाहांगीर खान के इस यू-टर्न पर कड़ा रुख अपनाते हुए कुणाल घोष ने बेहद व्यंग्यात्मक और फिल्मी अंदाज में हमला बोला। उन्होंने मशहूर फिल्म पुष्पा के डॉयलाग का सहारा लेते हुए सवाल दागा कि जो नेता हमेशा पुष्पा झुकेगा नहीं का नारा बुलंद करते थे, वे आज अचानक घुटनों पर क्यों आ गए और आखिर पुष्पा झुका क्यों? कुणाल घोष यहीं नहीं रुके, उन्होंने बिना नाम लिए पार्टी के उन बड़े चेहरों पर निशाना साधा जो खुद को संगठन का बॉस कहलवाते थे। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर ऐसी क्या मजबूरी थी और ऐसा कौन सा डर था जिसके चलते एक घोषित उम्मीदवार को ऐन वक्त पर पीछे हटना पड़ा। कुणाल घोष ने सीधा तंज कसते हुए यह भी याद दिलाया कि फलता का यह पूरा इलाका अभिषेक बनर्जी के सीधे प्रभाव और नियंत्रण वाला क्षेत्र माना जाता रहा है, इसलिए इस रहस्यमयी समर्पण का सही जवाब और यह कि पुष्पा झुका क्यों, खुद अभिषेक बनर्जी ही बेहतर तरीके से समझा सकते हैं।
तृणमूल के भीतर की यह चिंगारी अब धीरे-धीरे सुलगती हुई बगावत का रूप लेती दिख रही है क्योंकि कई असंतुष्ट विधायकों ने अलग से गुप्त बैठकें करनी भी शुरू कर दी हैं। इन बैठकों में संगठन की वर्तमान दुर्दशा, चुनावी हार के वास्तविक कारणों और शीर्ष नेतृत्व की कार्यप्रणाली को लेकर खुलकर असंतोष व्यक्त किया जा रहा है। पार्टी के भीतर अब सबसे बड़ा और यक्ष प्रश्न यह खड़ा हो गया है कि भविष्य में संगठन की कमान वास्तव में किसके हाथों में सुरक्षित रहेगी। 
राजनीतिक विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि जाहांगीर खान का अचानक मैदान छोडऩा और उसके तुरंत बाद कुणाल घोष का अपनी ही लीडरशिप को कटघरे में खड़ा करना यह साफ संकेत देता है कि तृणमूल कांग्रेस इस समय भीषण गुटबाजी और नेतृत्व के गंभीर संघर्ष से गुजर रही है। अब पूरी राजनीतिक बिरादरी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी पार्टी के भीतर भड़के इस आंतरिक असंतोष और बगावती सुरों को शांत करने के लिए क्या कदम उठाते हैं।

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