तारातला हादसे में पूर्व मेयर फिरहाद एवं दो पार्षदों के नाम शिकायत दर्ज; मरने वालों की संख्या हुई 17
खेला होबे का क्लाइमेक्स करीब, ममता के किले को ढहाने की तैयारी में 20 बागी सांसद!
कोलकाता। बंगाल के सियासी समंदर में उठा ऑपरेशन लोटस का चक्रवात अब सिर्फ कोलकाता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी लहरें सीधे दिल्ली के सत्ता गलियारों को हिला रही हैं। तृणमूल के 29 लोकसभा सांसदों में से करीब 18 से 20 सांसदों के पाला बदलने की खबरों ने देश की राष्ट्रीय राजनीति में भी भारी हलचल पैदा कर दी है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यदि यह महा-उलटफेर अपनी तार्किक परिणति तक पहुंचता है, तो यह न केवल बंगाल से ममता बनर्जी के वर्चस्व को हिला देगा, बल्कि केंद्र में बैठी भाजपा को सहयोगियों के दबाव से मुक्त कर एक सुपर-पावर के रूप में स्थापित कर देगा।
इस पूरे सियासी ड्रामे के पीछे बेहद शातिर और अचूक कानूनी गणित काम कर रहा है। लोकसभा में इस समय तृणमूल के पास 29 सांसद हैं। दल-बदल विरोधी कानून की कड़क तलवार से बचने के लिए राजनीतिक रणनीतिकारों ने दो-तिहाई सांसदों को एक साथ तोडऩे का चक्रव्यूह रचा है। संविधान के मुताबिक, यदि किसी पार्टी के दो-तिहाई सांसद एक साथ अलग गुट बनाते हैं, तो उनकी संसद सदस्यता रद्द नहीं होती। सूत्रों का दावा है कि अब तक 18 सांसदों के नाम पर दिल्ली से हरी झंडी मिल चुकी है और दो-तीन अन्य से अंतिम दौर की बातचीत जारी है। इस पूरी बिसात पर तड़का लगाते हुए प्रदेश भाजपा अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य ने साफ कह दिया है कि तृणमूल के बड़े नेताओं के लिए भाजपा के दरवाजे खुले हुए हैं।
भाजपा की इस महा-रणनीति के पीछे सिर्फ बंगाल को जीतना नहीं, बल्कि दिल्ली दरबार में अपनी स्थिति को अभेद्य बनाना है। वर्तमान में लोकसभा में भाजपा के पास 240 सांसद हैं और केंद्र सरकार पूरी तरह से एनडीए के सहयोगी दलों पर निर्भर है। यदि तृणमूल का यह बड़ा धड़ा भाजपा में शामिल होता है या उसे बिना शर्त समर्थन देता है, तो संसद के निचले सदन में भाजपा का आंकड़ा सीधे बहुमत के पार पहुंच जाएगा। इससे न सिर्फ सरकार की सहयोगियों पर निर्भरता कम होगी, बल्कि समान नागरिक संहिता जैसे कई महत्वपूर्ण और लंबित विधेयकों को पारित कराने में मोदी सरकार को अप्रत्याशित रूप से फ्री-हैंड मिल जाएगा।
चौंकाने वाली बात यह भी है कि लोकसभा के बाद भाजपा की नजरें राज्यसभा पर भी टिक गई हैं, जहां तृणमूल के 13 सदस्य हैं और उनमें से भी कुछ बड़े चेहरों के संपर्क में होने का दावा किया जा रहा है। इस पूरी कवायद की तुलना इस समय पंजाब के उस पंजाब मॉडल से की जा रही है, जहां कभी आम आदमी पार्टी के कई सांसदों को पाले में लाकर राज्यसभा में विपक्षी कुनबे को कमजोर कर दिया गया था।
इधर कोलकाता में ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के किचन कैबिनेट के बेहद खास माने जाने वाले सांसदों में मची इस भगदड़ से तृणमूल पूरी तरह डैमेज कंट्रोल मोड में आ गई है। विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार, टिकट बंटवारे को लेकर भीतर ही भीतर सुलगती चिंगारी, और चुनावी रणनीतिकार संस्था आईपैक की कार्यशैली से नाराज ये भारी-भरकम नेता अब दीदी का साथ छोडऩे का मन बना चुके हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आगामी मानसून सत्र के दौरान होने वाला यह ऐतिहासिक दल-बदल देश के विपक्षी समीकरणों को पूरी तरह ध्वस्त कर सकता है।