सिर्फ 'पुराने वफादारों' के दम पर क्या तृणमूल को डूबने से बचा पाएंगी ममता?
कोलकाता। बंगाल में सत्ता गंवाने के बाद चौतरफा संकटों से घिरी तृणमूल को एकजुट रखने की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की कोशिशों को एक और बड़ा झटका लगा है। शुक्रवार को ममता बनर्जी ने संकट से उबरने के लिए कालीघाट स्थित अपने आवास पर पार्टी के शीर्ष नेताओं की एक बेहद महत्वपूर्ण और आपातकालीन बैठक बुलाई। लेकिन, इस हाई-प्रोफाइल बैठक से पार्टी के बागी विधायकों ने पूरी तरह दूरी बनाए रखी, जिसने यह साफ कर दिया कि तृणमूल के भीतर की खाई अब पाटना नामुमकिन होता जा रहा है। बैठक में केवल अभिषेक बनर्जी, फिरहाद हकीम, कल्याण बनर्जी, मदन मित्रा, चंद्रिमा भट्टाचार्य और कुणाल घोष जैसे ममता समर्थक नेता ही नजर आए, जिन्हें राजनीतिक हलकों में पार्टी का मूल या पुराना वफादार खेमा माना जा रहा है।
तृणमूल के भीतर यह आंतरिक युद्ध उस समय चरम पर पहुंच गया था जब विधानसभा में विधायकों के एक बड़े समूह ने ममता बनर्जी के फैसले को चुनौती देते हुए ऋतोब्रत बनर्जी को अपना नेता प्रतिपक्ष चुन लिया था। इतना ही नहीं, बागी गुट ने ममता बनर्जी को सक्रिय राजनीति से हटाकर केवल मार्गदर्शक या सलाहकार की भूमिका में रहने की नसीहत तक दे डाली थी। सूत्रों के मुताबिक, इस बैठक से ठीक पहले ममता बनर्जी ने डैमेज कंट्रोल के तहत कुछ बागी विधायकों से व्यक्तिगत तौर पर संपर्क साधने का प्रयास भी किया था, ताकि वे बैठक में शामिल हों और विधानसभा में शक्ति संतुलन को दोबारा अपने पक्ष में कर नेता प्रतिपक्ष के पद पर नया दावा ठोका जा सके।
हालांकि, बागियों की सामूहिक अनुपस्थिति ने ममता की इन उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। अब यह असंतोष सिर्फ विधानसभा तक सीमित न रहकर लोकसभा और राज्यसभा संसदीय दल तक भी पहुंच चुका है, जिससे पार्टी के नाम, संगठन और चुनाव चिह्न पर नियंत्रण को लेकर कानूनी और राजनीतिक लड़ाई तेज होने के कयास लगाए जा रहे हैं। कालीघाट की इस बेनतीजा बैठक के बाद अब राजनीतिक गलियारों में यह यक्ष प्रश्न और गहरा गया है कि क्या ममता बनर्जी तृणमूल को बिखरने से रोक पाएंगी?