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स्कूल ड्रॉपआउट, लेकिन साइबर ठगी में माहिर!

कम पढ़ाई, कम मेहनत-फिर भी लाखों की कमाई, पुलिस के हत्थे चढ़ा गैंग

26 Jul 2025

स्कूल ड्रॉपआउट, लेकिन साइबर ठगी में माहिर!

कोलकाता। पढ़ाई छोड़े काफी समय बीत गया हैं, कोई महज पांचवीं तक, तो कोई आठवीं या ग्यारहवीं तक की ही शिक्षा हासिल कर पाया। पढ़ाई भले ही कम की हो लेकिन नवावी के सपने किसी पढ़े लिखें से कम नहीं। हाई प्रोफाइल जीवनशैली जिसे देख हर कोई हक्का बक्का थे। आखिर बीन पढ़े लिखे और महज 18 से 19 साल की उम्र में रईसों वाली रसुख भला कैसे? 
जवाब था साइबर ठगी। हाल ही में गार्डनरीच और हावड़ा के एक मॉल के पास से सात युवकों को साइबर अपराध के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। गिरफ्तार सभी आरोपियों की उम्र 18 से 23 के बीच थी और इनमें से ज्यादातर हैं स्कूल ड्रॉपआउट। कम पढ़ाई, लेकिन स्मार्टफोन और तकनीक के सहारे इन युवाओं ने एटीएम धोखाधड़ी और बैंक खाते के फर्जीवाड़े से मोटी कमाई का रास्ता बना लिया था। 
पुलिस का कहना है, ये लोग एक लाख रुपये की ठगी पर 22 से 35 हजार रुपये का कमीशन पाते थे और अगर महीने में ऐसी 4-5 ठगी हो जाए, तो कमाई सीधी लाख रुपये पार।  गिरफ्तार आरोपियों के प्रोफाइल ने तो पुलिस को भी चौका दिया हैं। गिरफ्तार किये गये शेख शहरिद कोदारी जिसकी उम्र महज 20 साल की हैं और पढ़ाई महज पांचवीं तक। पिता पेशे से टैक्सी ड्राइवर। पुलिस ने इसके पास से 5 एटीएम कार्ड बरामद किये हैं। इन एटीएम कार्ड का इस्तेमाल ओडिशा के भद्रक निवासी शाहबाज नामक शख्स के बैंक खाते को किराए पर लेकर ठगी का पैसा ट्रांसफर करता था। दूसरे आरोपी जिसकी उम्र केवल 19 वर्ष हैं और हैं नाम आशिक मिस्त्री। आशिक बारहवीं का छात्र हैं और पिता पेशे से दर्जी हैं। इसके पास से भी पुलिस को 4 एटीएम कार्ड मिले हैं। तीसरे की उम्र महज 18 साल की हैं और नाम हैं शेख असफाक, ये केवल  आठवीं तक पढ़ा और इतनी कम उम्र में ठगी के जरिये उसने घर से लेकर कार तक खरीद डाला। 
कोलकाता पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि कम पढ़े-लिखे होने के बावजूद आज की पीढ़ी तकनीक की बारीकियां जानती है और ऊंचे जीवन की लालसा में ये गलत रास्ता चुन रहे हैं।  सीआईडी के पूर्व डिप्टी आई (साइबर क्राइम) कल्याण मुखर्जी ने बताया कि इस अपराध में ज्यादा मेहनत नहीं लगती। थोड़ी तकनीकी जानकारी और चालाकी से काम बन जाता है। ऊपर से मोटी कमाई का लालच कम उम्र के लड़कों को आकर्षित कर रहा है। इन अपराधियों को न बंदूक चाहिए, न गैंगवार सब कुछ मोबाइल, बैंक अकाउंट और इंटरनेट के जरिए होता हैं। कम जोखिम, ज्यादा पैसा और यही युवाओं के लिए क्राइम में उतरने का नया कारण बन गया हैं। स्कूल छोडऩे के बाद पढ़ाई भले बंद हो गई हो, लेकिन ठगी के तरीके सीखने में ये युवा काफी आगे निकल चुके हैं। सवाल ये है कि तकनीक के इस 'काली दुनियाÓ में कदम रखने से पहले इन्हें कौन रोक पाएगा? पुलिस का अगला टारगेट पूरे नेटवर्क की पहचान और मास्टरमाइंड की गिरफ्तारी हैं जो पुलिस के लिये एक बड़ी चूनौती बनकर उभरी हैं। 

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