सियासत में जुबानी जंग तेज, तृणमूल ने बताया लोकतंत्र पर हमला
कोलकाता। विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही राज्य का राजनीतिक पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया है। भाजपा के फायरब्रांड नेता और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष के एक ताजा बयान ने बंगाल की राजनीति में बारूद भरने का काम किया है। राज्य की मंत्री डॉ. शशि पांजा के आवास पर हुए कथित हमले की पृष्ठभूमि में दिलीप घोष ने सीधे मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के आवास कालीघाट का जिक्र करते हुए ऐसी टिप्पणी की है, जिसने सत्ताधारी तृणमूल को सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक हमलावर होने का मौका दे दिया है।
रविवार सुबह इको पार्क में भ्रमण के दौरान पत्रकारों से मुखातिब घोष ने तीखे तेवर अपनाते हुए कहा कि भाजपा को किसी बाहरी ताकत की जरूरत नहीं है, कार्यकर्ता खुद तृणमूल का मुकाबला करने में सक्षम हैं। विवाद तब बढ़ा जब उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि अगर शशि पांजा के घर हमला हो सकता है, तो कालीघाट में भी हमला हो सकता है। उनके इस बयान को सीधे तौर पर मुख्यमंत्री की सुरक्षा और गरिमा को चुनौती देने के रूप में देखा जा रहा है। इतना ही नहीं, घोष ने यहाँ तक कह दिया कि यदि तृणमूल नेता हद पार करेंगे, तो उन्हें वैसा ही जवाब मिलेगा। उनके बयान में बम और हथियारों का जिक्र होने से पुलिस और प्रशासन की चिंताएं भी बढ़ गई हैं। यह विवाद ऐसे समय में आया है जब ब्रिगेड मैदान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली के दौरान महानायक मिथुन चक्रवर्ती ने भी ममता बनर्जी को आईसीयू में भेज देने जैसी विवादित टिप्पणी की थी। इन बयानों की कडिय़ों को जोड़ते हुए तृणमूल ने भाजपा पर सुनियोजित तरीके से राज्य में हिंसा और डर का माहौल पैदा करने का आरोप लगाया है।
मंत्री शशि पांजा ने अपने घर पर हुए हमले को जानलेवा साजिश बताते हुए भाजपा समर्थकों को कटघरे में खड़ा किया है। पलटवार करते हुए तृणमूल के वरिष्ठ नेताओं ने कहा कि एक वरिष्ठ जनप्रतिनिधि द्वारा मुख्यमंत्री के निवास को लेकर इस तरह की भाषा का प्रयोग करना न केवल असंसदीय है, बल्कि बंगाल की संस्कृति के खिलाफ भी है। पार्टी का दावा है कि भाजपा चुनाव से पहले अपनी संगठनात्मक कमजोरी और आंतरिक गुटबाजी को छिपाने के लिए हताशा में इस तरह की धमकी भरी राजनीति का सहारा ले रही है। तृणमूल ने स्पष्ट किया कि बंगाल की जनता ऐसी डराने वाली राजनीति का जवाब मतपेटियों के जरिए देगी। दूसरी ओर, भाजपा इन आरोपों को राजनीतिक नाटक करार दे रही है।
पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का मानना है कि 2026 का चुनाव करो या मरो की लड़ाई है, इसलिए आक्रामकता उनकी रणनीति का हिस्सा है। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का तर्क है कि इस तरह की चरम बयानबाजी ध्रुवीकरण को तो तेज कर सकती है, लेकिन यह विकास और सुरक्षा के मुद्दों को हाशिए पर धकेल देती है। फिलहाल, कालीघाट से लेकर इको पार्क तक बयानों की इस चिंगारी ने बंगाल के चुनावी समर को और भी ज्यादा गर्मा दिया है।