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विपक्ष के नेता का दर्जा न मिलने पर शोभनदेव का विधानसभा सचिवालय पर हमला

स्पीकर ने लिखित समर्थन मांगा

18 May 2026

विपक्ष के नेता का दर्जा न मिलने पर शोभनदेव का विधानसभा सचिवालय पर हमला

कोलकाता। विधानसभा में विपक्ष के नेता (एलओपी) का दर्जा न मिलने को लेकर राज्य की सियासत और प्रशासनिक गलियारों में तनातनी चरम पर पहुंच गई है। तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ विधायक और बालीगंज से जनप्रतिनिधि शोभनदेव चट्टोपाध्याय ने उन्हें अब तक आधिकारिक मान्यता न दिए जाने पर विधानसभा सचिवालय के खिलाफ खुलकर मोर्चा खोल दिया है। इस प्रशासनिक गतिरोध से नाराज शोभनदेव ने अब सूचना के अधिकार कानून का सहारा लेते हुए सचिवालय में आवेदन दाखिल किया है और सीधे तौर पर पूछा है कि आखिर किस नियम और तकनीकी पेंच के तहत उनकी मान्यता को रोककर रखा गया है। तृणमूल का आरोप है कि बीते 13 मई को ही पार्टी की ओर से विधानसभा अध्यक्ष (स्पीकर) रथींद्रनाथ बसु के कार्यालय को एक आधिकारिक पत्र भेजा गया था। इस पत्र में साफ तौर पर 80 विधायकों के लिखित समर्थन के साथ शोभनदेव चट्टोपाध्याय को सर्वसम्मति से तृणमूल विधायक दल का नेता घोषित किए जाने की जानकारी दी गई थी। इसके बावजूद पांच दिन बीत जाने के बाद भी विधानसभा सचिवालय की ओर से उन्हें विपक्ष के नेता के रूप में कोई औपचारिक पत्र या मान्यता जारी नहीं की गई है, जिसे तृणमूल ने अपने संवैधानिक अधिकारों का हनन बताया है। 
पार्टी सूत्रों के मुताबिक, जिस दिन यह पत्र भेजा गया था, उस समय स्पीकर रथींद्रनाथ बसु अपने कार्यालय में मौजूद नहीं थे, जिसके कारण यह महत्वपूर्ण दस्तावेज विधानसभा सचिव समरेंद्रनाथ दास को सौंप दिया गया था। तृणमूल का कहना है कि पर्याप्त संख्या बल होने के बावजूद जानबूझकर इस आदेश को लटकाया जा रहा है। 
दूसरी ओर, इस पूरे विवाद पर विधानसभा सचिवालय ने भी अपना पक्ष सामने रखा है। सचिवालय के सूत्रों का कहना है कि तृणमूल विधायक दल की ओर से केवल नेता के नाम का प्रस्ताव भेजा गया था। सचिवालय ने एक जवाबी पत्र जारी कर स्पष्ट किया है कि जिस बैठक में शोभनदेव को विपक्ष का नेता चुना गया था, उस बैठक के मूल प्रस्ताव और उस पर सभी 80 विधायकों के हस्ताक्षर वाला वास्तविक दस्तावेज भी जमा किया जाए, जिसके बाद ही इस प्रक्रिया को कानूनी रूप से आगे बढ़ाया जाएगा।
नियमों के मुताबिक, 294 सदस्यीय पश्चिम बंगाल विधानसभा में किसी भी राजनीतिक दल को मुख्य विपक्षी दल का दर्जा हासिल करने के लिए कम से कम 30 विधायकों के समर्थन की आवश्यकता होती है। तृणमूल के पास वर्तमान में 80 विधायक हैं, जो तय आंकड़े से कहीं अधिक है। यही वजह है कि पार्टी इसे महज एक तकनीकी बहाना बनाकर परेशान करने की रणनीति बता रही है। 
शोभनदेव ने इस पूरी प्रक्रिया पर हैरानी जताते हुए कहा कि विधानसभा के इतिहास में नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति के लिए इस तरह के जटिल पत्राचार की परंपरा नहीं रही है। सचिवालय प्राथमिक सूचना के आधार पर ही सीधे संबंधित विधायक को मान्यता दे देता है। इस बार असामान्य रूप से देरी की जा रही है और हद तो यह है कि विधानसभा में विपक्ष के नेता के लिए आवंटित कार्यालय पर भी ताला लटका दिया गया है।
अपने तीखे तेवर दिखाते हुए शोभनदेव ने कहा कि उन्हें मजबूरन आरटीआई (क्रञ्जढ्ढ) का रास्ता चुनना पड़ा। उन्होंने अपने आवेदन में पूछा है कि साल 2011, 2016 और 2021 में जब राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेताओं को मान्यता दी गई थी, तब सचिवालय ने किस नियम और प्रक्रिया का पालन किया था। सोमवार को शोभनदेव जब विधानसभा पहुंचे, तो एलओपी (रुह्रक्क) का कमरा बंद होने के कारण उन्हें काफी देर तक विधानसभा की लॉबी में ही बैठकर अपना कामकाज निपटाना पड़ा, जिसके बाद वह नाराज होकर वहां से लौट गए। 
गौरतलब है कि तृणमूल की ओर से भेजे गए इसी विवादित पत्र में शोभनदेव को नेता प्रतिपक्ष बनाने के साथ-साथ पूर्व मंत्री फिरहाद हाकिम को मुख्य सचेतक (चीफ व्हिप) तथा नयना बंदोपाध्याय और असीमा पात्रा को उपनेता बनाए जाने की भी आधिकारिक घोषणा की गई थी, जिन पर भी फिलहाल सस्पेंस बरकरार है।

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