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श्यामा प्रसाद मुखर्जी नहीं होते तो असम और पश्चिम बंगाल का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान में होता: अमित शाह

केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने सोमवार को भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि यदि मुखर्जी नहीं होते तो आज कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं होता और असम तथा पश्चिम बंगाल का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान में चला गया होता।

06 Jul 2026

श्यामा प्रसाद मुखर्जी नहीं होते तो असम और पश्चिम बंगाल का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान में होता: अमित शाह

नई दिल्ली। केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने सोमवार को भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि यदि मुखर्जी नहीं होते तो आज कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं होता और असम तथा पश्चिम बंगाल का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान में चला गया होता। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अनुच्छेद 370 हटाकर डॉ. मुखर्जी के सपने को साकार किया।

सहकारिता मंत्रालय के पांचवें स्थापना दिवस पर नई दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए शाह ने कहा कि डॉ. मुखर्जी ने करोड़ों कार्यकर्ताओं के जीवन में भारतीयता, भारत माता के प्रति श्रद्धा और भारतीय संस्कृति के महत्व को स्थापित करने के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया।

उन्होंने कहा कि डॉ. मुखर्जी ने एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चल सकते के सिद्धांत को लेकर आंदोलन का नेतृत्व किया और इसके लिए अपने प्राणों का भी बलिदान दिया। शाह ने कहा कि अनुच्छेद 370 को हटाकर प्रधानमंत्री मोदी ने उनके उस संकल्प को पूरा किया।

गृहमंत्री ने कहा कि देश के विभाजन के इतिहास को समझने वाले जानते हैं कि यदि डॉ. मुखर्जी ने तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व को चुनौती नहीं दी होती तो आज असम और पश्चिम बंगाल का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान में होता। मुखर्जी के प्रयासों के कारण ही असम और पश्चिम बंगाल भारत के गौरवपूर्ण हिस्से बने रहे।

शाह ने कहा कि केंद्र सरकार डॉ. मुखर्जी की 125वीं जयंती पूरे देश में बड़े पैमाने पर मनाएगी। उन्होंने कहा कि उनके विचारों और योगदान को शहरी तथा ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंचाने के लिए विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।

उन्होंने कहा कि डॉ. मुखर्जी का मानना था कि भारत का शासन देश की अपनी सांस्कृतिक परंपराओं, स्थानीय मान्यताओं और राष्ट्रीय मूल्यों के अनुरूप संचालित होना चाहिए तथा उनका सार्वजनिक जीवन इसी विचार के प्रति समर्पित रहा।

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