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सुप्रीम कोर्ट की बड़ी व्यवस्था, कानून के दायरे में ही मिलेगी इजाजत

वोट देना और चुनाव लडऩा मौलिक अधिकार नहीं

12 Apr 2026

सुप्रीम कोर्ट की बड़ी व्यवस्था, कानून के दायरे में ही मिलेगी इजाजत

कोलकाता। देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया और नागरिकों के अधिकारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट रुख अपनाते हुए कहा है कि मतदान करना या चुनाव में प्रत्याशी के तौर पर उतरना कोई मौलिक अधिकार नहीं है। अदालत के अनुसार, ये दोनों ही विधिक या वैधानिक अधिकार हैं, जिनका अस्तित्व और संचालन पूरी तरह से संबंधित कानूनों द्वारा तय की गई शर्तों और सीमाओं पर निर्भर करता है। इस टिप्पणी के साथ ही सर्वोच्च न्यायालय ने राजस्थान हाई कोर्ट के एक पुराने फैसले को पलटते हुए कानूनी स्थिति को फिर से परिभाषित कर दिया है। यह अहम फैसला न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने राजस्थान के एक सहकारी चुनाव से संबंधित याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया। 
पीठ ने अपने प्रेक्षण में दो टूक कहा कि यह कानूनी रूप से पहले से ही स्थापित स्थिति है कि मतदान और उम्मीदवारी का अधिकार संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों की श्रेणी में नहीं आता। अदालत ने जोर देकर कहा कि इन अधिकारों का स्रोत संविधान की मूल आत्मा के बजाय वे कानून और उपनियम हैं, जिनके तहत चुनाव आयोजित किए जाते हैं। सरल शब्दों में, यदि कानून किसी विशेष योग्यता या शर्त को अनिवार्य बनाता है, तो उसे अधिकार का हनन नहीं माना जा सकता। मामले की पृष्ठभूमि राजस्थान के 'डिस्ट्रिक्ट मिल्क प्रोड्यूसर्स को-ऑपरेटिव यूनियनÓ की प्रबंधन समिति के चुनावों से जुड़ी है। इस सहकारी संस्था ने अपने उपनियमों में संशोधन कर चुनाव लडऩे वाले उम्मीदवारों के लिए कुछ विशेष योग्यता मानदंड निर्धारित किए थे। राजस्थान हाई कोर्ट ने पूर्व में इन मानदंडों को अनुचित मानते हुए खारिज कर दिया था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस पर असहमति जताते हुए कहा कि राजस्थान सहकारी समिति कानून के तहत ऐसे विवादों के निपटारे के लिए पहले से ही एक सुव्यवस्थित तंत्र मौजूद है। 
शीर्ष अदालत ने माना कि हाई कोर्ट द्वारा इन नियमों को अवैध ठहराना न्यायोचित नहीं था। अदालत ने अपने फैसले में एक सूक्ष्म अंतर को भी स्पष्ट किया। पीठ ने कहा कि संस्था के उपनियम केवल सक्रिय भागीदारी और प्रबंधन में शामिल होने के लिए योग्यता तय करते हैं, वे किसी भी सदस्य के मूल मतदान के अधिकार को पूरी तरह छीनते नहीं हैं। इस महत्वपूर्ण कानूनी बारीकी को आधार बनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सहकारी संस्था के उपनियमों की वैधता को बरकरार रखा। इस फैसले ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि लोकतंत्र में भागीदारी के अधिकार महत्वपूर्ण तो हैं, लेकिन वे निरंकुश नहीं हैं और विधायी दायरे के भीतर ही काम करते हैं।  

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