सिर पर दस्तावेजों का संदूक लादकर आयोग की दहलीज पर पहुँचा बुजुर्ग
कोलकाता। कहते हैं लोकतंत्र में 'जनता जनार्दन' होती है, लेकिन पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम से आई एक तस्वीर ने इस दावे की जमीनी हकीकत बयां कर दी है। रविवार को चुनाव आयोग द्वारा आयोजित एसआईआर (विशेष जांच रिपोर्ट) की सुनवाई के दौरान एक ऐसा दृश्य दिखा, जिसने सरकारी तंत्र की जटिलता और एक आम नागरिक की बेबसी को पूरी दुनिया के सामने लाकर खड़ा कर दिया। एक बुजुर्ग, अपनी और अपने परिवार की नागरिकता व मतदाता सूची में नाम बरकरार रखने के लिए, सिर पर लोहे का भारी-भरकम ट्रंक (संदूक) लादकर सुनवाई केंद्र पहुंचे। नंदीग्राम के रहने वाले इस बुजुर्ग को मतदाता सूची में तार्किक विसंगति और पारिवारिक संबंधों की जांच के सिलसिले में आयोग ने तलब किया था। बुजुर्ग का कसूर सिर्फ इतना था कि उनसे परिवार की कई पीढिय़ों के ऐसे साक्ष्य मांगे गए थे, जिन्हें संभालना एक साधारण फाइल या बैग के बस की बात नहीं थी। क्या था संदूक में: ट्रंक के भीतर दशकों पुराने जमीन के रिकॉर्ड, वंशावली के कागजात, पुराने पहचान पत्र और पारिवारिक दस्तावेज ठसाठस भरे थे।
बुजुर्ग के अनुसार, आयोग की मांगों की सूची इतनी लंबी थी कि उन्हें डर था कि कहीं एक भी कागज छूट जाने पर उन्हें संदिग्ध न मान लिया जाए। जब यह बुजुर्ग पसीने से तर-बतर होकर भारी ट्रंक सिर पर रखे केंद्र के पास पहुंचे, तो वहां तैनात पुलिसकर्मियों ने सुरक्षा कारणों से उन्हें रोकने का प्रयास किया। लेकिन जैसे ही बुजुर्ग ने संदूक खोलकर भीतर रखे कागजों का ढेर दिखाया, वहां मौजूद अधिकारी और सुरक्षाकर्मी अवाक रह गए। कुछ देर के लिए वहां सन्नाटा पसर गया, मानो सिस्टम अपनी ही जटिलता पर शर्मिंदा हो। इस घटना ने राज्य की राजनीति में भी गर्माहट पैदा कर दी है। हाल ही में राज्य की मंत्री शशि पांजा ने भी आयोग की इस सुनवाई प्रक्रिया में अत्यधिक पुराने दस्तावेज मांगे जाने का पुरजोर विरोध किया था। नंदीग्राम की इस तस्वीर के वायरल होने के बाद विपक्षी दलों और नागरिक समाज ने डिजिटल इंडिया के दावों पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। क्या आधुनिक युग में भी एक वृद्ध व्यक्ति को अपनी पहचान और वफादारी साबित करने के लिए लोहे के संदूक भर-भर कर कागजात ढोने पड़ेंगे? एसआईआर की यह सुनवाई उन मतदाताओं के लिए आयोजित की जा रही है जिनके नामों में तकनीकी खामियां पाई गई हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि आयोग को दस्तावेजों के सत्यापन के लिए अधिक मानवीय और तकनीक-अनुकूल रुख अपनाना चाहिए, ताकि समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति को इस तरह की शारीरिक और मानसिक प्रताडऩा न झेलनी पड़े।