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बकरीद से पहले पशु वध संबंधी राज्य सरकार की पाबंदियों पर हाई कोर्ट में हुई सुनवाई

विपक्षी पक्षों का दावा है कि इन नियमों के कारण बकरीद के दौरान कुर्बानी को लेकर अनिश्चितता की स्थिति पैदा हो गई है

21 May 2026

बकरीद से पहले पशु वध संबंधी राज्य सरकार की पाबंदियों पर हाई कोर्ट में हुई सुनवाई

कोलकाता। कोलकाता में बकरीद से पहले राज्य सरकार द्वारा गाय और भैंस के वध पर लगाए गए प्रतिबंधों को लेकर दायर जनहित याचिकाओं पर गुरुवार को कलकत्ता उच्च न्यायालय में सुनवाई हुई।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विकास भट्टाचार्य ने दलील दी कि यदि किसी कानून को लंबे समय तक प्रभावी रूप से लागू नहीं किया जाता, तो उसकी वैधानिकता कमजोर पड़ जाती है। इस पर अदालत ने टिप्पणी की कि यदि कानून प्रभावी नहीं होता, तो इतने बड़े पैमाने पर याचिकाएं दाखिल ही नहीं होतीं।
याचिकाकर्ता रामकृष्ण पाल ने अदालत से मांग की कि गायों के वध पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए। उन्होंने कहा कि बकरीद के नाम पर निरीह पशुओं की हत्या की जाती है। उनके अनुसार हिंदू धार्मिक परंपरा में ‘बलिदान’ का अर्थ पशु हत्या नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर की पशु प्रवृत्तियों का दमन है।
दूसरे याचिकाओं मोहम्मद जफर यासनी की ओर से दलील दी गई कि ईद-उल-अजहा के दौरान कुर्बानी को लेकर सरकार को स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने चाहिए और अधिकृत बूचड़खानों की सूची सार्वजनिक की जानी चाहिए। कहा कि बड़ी संख्या में अशिक्षित और अल्पशिक्षित लोग इस कार्य से जुड़े हैं, जिन्हें कानून की जानकारी नहीं है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि बकरीद 28 मई को है, तो इतने कम समय में नई व्यवस्था को प्रभावी ढंग से लागू करना कैसे संभव होगा। अदालत को बताया गया कि राज्य सरकार को सभी पक्षों से चर्चा के बाद ही इस तरह का निर्णय लेना चाहिए था।
मोहम्मद शाकिल वारसी के अधिवक्ता सव्यसाची चट्टोपाध्याय ने राज्य सरकार की अधिसूचना को रद्द करने की मांग की। कहा कि 1950 के पशुधन कानून के तहत फिटनेस प्रमाणपत्र अनिवार्य है, लेकिन राज्य में इसके लिए पर्याप्त व्यवस्था नहीं है, जिससे व्यावहारिक समस्याएं पैदा हो रही हैं।
वहीं, जमीयत-ए-उलेमा के अधिवक्ता विकास रंजन भट्टाचार्य ने कहा कि यह कानून बदलती परिस्थितियों में नए सिरे से व्याख्या की जानी चाहिए।दावा किया कि पश्चिम बंगाल में मवेशियों की संख्या और दुग्ध उत्पादन लगातार बढ़ रहा है, जबकि उत्तर प्रदेश में पूर्ण प्रतिबंध के बावजूद पशुओं की संख्या में कमी देखी जा रही है।
उन्होंने तर्क दिया कि यह कानून केवल उन नगर क्षेत्रों में लागू हो सकता है, जो 1952 में नगरपालिका क्षेत्र थे।
कोलकाता और कालिम्पोंग के बाहर इस कानून को लागू करने पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि पंचायत क्षेत्रों को कभी औपचारिक रूप से अधिसूचित नहीं किया गया। साथ ही बिना वैज्ञानिक परीक्षण के किसी पशु की आयु निर्धारित करना भी व्यावहारिक नहीं है।
अदालत ने सुनवाई के दौरान यह भी कहा कि हर वर्ष इस मुद्दे पर अधिसूचना जारी होती रही है, इसलिए इसे पूरी तरह अप्रभावी कहना उचित नहीं होगा। अब मामले की आगे की सुनवाई जारी रहेगी।
उल्लेखनीय है कि, राज्य में सत्ता में आने के बाद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार ने 1950 के पशुधन कानून के कुछ प्रावधानों को सख्ती से लागू किया है। नए निर्देशों के अनुसार प्रशासनिक अनुमति के बिना मवेशियों का वध नहीं किया जा सकता और 14 वर्ष से कम आयु के पशुओं को काटने पर रोक है। इसके अलावा मांस विक्रय के लिए स्थानीय निकाय अथवा पशुपालन विभाग की लिखित अनुमति आवश्यक की गई है। विपक्षी पक्षों का दावा है कि इन नियमों के कारण बकरीद के दौरान कुर्बानी को लेकर अनिश्चितता की स्थिति पैदा हो गई है।

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