पश्चिम बंगाल सरकार ने यूसीसी मसौदे के अध्ययन के लिए नौ सदस्यीय समिति की अधिसूचित
साफ है कि 2026 से पहले तृणमूल कोई जोखिम नहीं लेना चाहती
कोलकाता। तीन साल में सियासी समीकरण तेजी से बदले हैं। 2021 के विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों की तुलना ने तृणमूल कांग्रेस की चिंता बढ़ा दी है। कई ऐसी विधानसभा सीटें, जहां कभी तृणमूल ने भारी अंतर से जीत दर्ज की थी, वहां लोकसभा चुनाव में या तो जीत का अंतर आधे से ज्यादा घट गया या पार्टी को हार का सामना करना पड़ा। इन्हीं आंकड़ों से उभरती 'आशंकाÓ के बीच मतदाता सूची के एसआईआर के दूसरे चरण को लेकर तृणमूल सतर्क हो गई है। पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी अब संगठन को नए सिरे से अलर्ट मोड में लाना चाहते हैं। इसी कड़ी में वे आगामी रविवार को एक बड़ी वर्चुअल बैठक करने जा रहे हैं, जिसमें बूथ स्तर से लेकर राज्य स्तर तक के करीब एक लाख नेता और कार्यकर्ता शामिल होंगे। बैठक में एसआईआर के दूसरे चरण के दौरान अपनाई जाने वाली रणनीति और घटते अंतर वाली सीटों पर विशेष फोकस का रोडमैप रखा जाएगा। उत्तर से दक्षिण बंगाल तक विधानसभा स्तर पर किए गए विश्लेषण में सामने आया है कि 2021 में जिन सीटों पर तृणमूल ने शानदार जीत दर्ज की थी, वहां 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को झटका लगा। कई सीटों पर जीत का अंतर आधे से भी ज्यादा घट गया, तो कहीं विधानसभा में जीती सीटों पर लोकसभा चुनाव में पार्टी पिछड़ गई। खास तौर पर 10 हजार से कम वोटों के अंतर वाली सीटों को तृणमूल ने हाई रिस्क कैटेगरी में रखा है।
समस्या यह भी है कि ये सीटें किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं ग्रामीण, कस्बाई और शहरी इलाकों में समान रूप से फैली हुई हैं। यही वजह है कि पार्टी के लिए एक समान संगठनात्मक फार्मूला तैयार करना मुश्किल हो रहा है। लोकसभा चुनाव के नतीजों ने यह साफ कर दिया कि तृणमूल के कई बड़े चेहरे भी सुरक्षित नहीं हैं। राशबिहारी में देवाशीष कुमार 2021 में 21 हजार वोट से जीते थे, लोकसभा में अंतर घटकर हजार से भी कम रह गया। बिधाननगर में मंत्री सुजीत बोस की सीट पर तृणमूल लोकसभा में 11 हजार वोट से पीछे रही। श्यामपुकुर में मंत्री शशि पांजा का 22 हजार का विधानसभा अंतर लोकसभा में बदलकर हजार से कम की बढ़त बन गया। सोनारपुर दक्षिण में लवली मोइत्रा की सीट पर अंतर 26 हजार से घटकर 10 हजार रह गया। चंदननगर में मंत्री इंद्रनील सेन की 31 हजार की जीत लोकसभा में सिर्फ 7 हजार पर सिमट गई। संदेशखाली में तो तस्वीर ही पलट गई यहाँ विधानसभा में 40 हजार से जीती तृणमूल, लोकसभा में भाजपा करीब साढ़े आठ हजार वोट से आगे निकल गई थी। ऐसी दर्जनों सीटें पूरे राज्य में फैली हुई हैं। तृणमूल के शीर्ष नेतृत्व में यह धारणा बन रही है कि आने वाले चुनाव में मुकाबला सिर्फ भाजपा से नहीं, बल्कि चुनाव आयोग की प्रक्रियाओं से भी होगा।
पार्टी के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि जहां भाजपा मजबूत है, वहां आयोग कुछ नहीं करेगा। जहां तृणमूल का दबदबा है, वहां भी ज्यादा कुछ नहीं हो पाएगा। लेकिन जहां दोनों की ताकत करीब-करीब बराबर है, वहीं आयोग की भूमिका निर्णायक हो सकती है। इसी आशंका के चलते पार्टी पहले से संगठनात्मक रणनीति मजबूत करने में जुट गई है। रविवार की बैठक में अभिषेक इसी पर जोर देंगे। पहले चरण में वे 13 वरिष्ठ नेताओं को जिलों में भेज चुके हैं। दूसरे चरण में भी इसी तरह की कड़ी निगरानी की तैयारी है। लोकसभा चुनाव के नतीजों में यह सामने आया था कि शहरी और कस्बाई इलाकों में तृणमूल को झटका लगा, लेकिन ग्रामीण समर्थन के दम पर पार्टी ने नुकसान की भरपाई कर ली और भाजपा को 18 से 12 सीटों पर ला दिया। अब एसआईआर के दूसरे चरण को लेकर तृणमूल का आरोप है कि ग्रामीण मतदाताओं को ज्यादा परेशान किया जा रहा है। ग्रामीण इलाकों में सुनवाई के लिए सिर्फ एसडीओ या बीडीओ कार्यालय तय किए गए हैं, जबकि शहरों में कई जगह सुनवाई केंद्र बनाए गए हैं, जिससे शहरी मतदाताओं को सुविधा मिल रही है। पार्टी इसे 'ग्रामीण वोटरों को परेशान करने की रणनीतिÓ बता रही है। हाल ही में चुनाव आयोग से मुलाकात में बैरकपुर के सांसद पार्थ भौमिक इस मुद्दे पर सबसे मुखर रहे। तृणमूल अब दूसरे चरण में ग्रामीण इलाकों पर विशेष जोर देना चाहती है, ताकि शहरी नुकसान की भरपाई फिर से गांवों के दम पर की जा सके।
2021 में भाजपा को 'बंगाल-विरोधी बताकर और 2024 में केंद्र की बंगाल से वंचना को मुद्दा बनाकर चुनाव लड़ चुकी तृणमूल 2026 में भी बंगाल और बांगाली अस्मिता के एजेंडे से पीछे नहीं हटना चाहती। इसके साथ ही पार्टी 15 साल के शासन का लेखा-जोखा जनता के सामने रखने की तैयारी में है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पहले ही उन्नयन की पांचाली जारी कर चुकी हैं। अब स्थानीय स्तर पर यह बताया जाएगा कि अब तक क्या-क्या काम हुए और अगले 10 वर्षों में राज्य की दिशा क्या होगी। साफ है कि 2026 से पहले तृणमूल कोई जोखिम नहीं लेना चाहती। घटते अंतर वाली सीटें, एसआईआर का दूसरा चरण और ग्रामीण वोट बैंक यही तीन बड़े मोर्चे हैं, जिन पर अभिषेक बनर्जी की अगुवाई में पार्टी पूरी ताकत झोंकने जा रही है।