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तृणमूल पार्षदों का छलका दर्द, कहा-घर से निकलना हो गया मुश्किल

नतीजों के 72 घंटों के भीतर ही तृणमूल के भीतर आत्मसमर्पण और पलायन की स्थिति दिखने लगी है

07 May 2026

तृणमूल पार्षदों का छलका दर्द, कहा-घर से निकलना हो गया मुश्किल

कोलकाता। बंगाल की सत्ता में आए ऐतिहासिक परिवर्तन ने अब राज्य की राजधानी कोलकाता के नगर निगम समीकरणों को पूरी तरह हिला दिया है। भाजपा की लुक ईस्ट नीति और बंगाल में प्रचंड बहुमत के साथ जीत ने अब नवान्न के बाद छोटे लालबाड़ी की राह भी आसान कर दी है। विधानसभा चुनाव के नतीजों ने साफ कर दिया है कि कोलकाता की जनता का झुकाव अब भगवा खेमे की ओर है, जिससे तृणमूल कांग्रेस के भीतर अपनी आखिरी मजबूत किला कोलकाता नगर निगम को बचाने की चिंता सताने लगी है। नगर निगम क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली 16 विधानसभा सीटों के आंकड़ों ने तृणमूल नेतृत्व की नींद उड़ा दी है। 
भाजपा ने इनमें से 11 सीटों पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की है। यदि वार्डवार आंकड़ों को देखें, तो स्थिति और भी गंभीर नजर आती है। कुल 144 वार्डों में से भाजपा ने 101 वार्डों में ठोस बढ़त हासिल की है, जबकि सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस महज 43 वार्डों तक सिमट कर रह गई है। यह आंकड़ा बताता है कि कोलकाता का शहरी मतदाता अब बदलाव की लहर के साथ बह रहा है। भाजपा सूत्रों के अनुसार, शपथ ग्रहण के बाद पहली प्राथमिकता सचिवालय को नवान्न (हावड़ा) से वापस कोलकाता की ऐतिहासिक महाकरण (राइटर्स बिल्डिंग) ले जाने की है। सत्ता के इस केंद्र परिवर्तन को प्रतीकात्मक रूप से कोलकाता पर नियंत्रण की पहली सीढ़ी माना जा रहा है। 9 मई (25 बैशाख) को ब्रिगेड में होने वाले शपथ ग्रहण समारोह के बाद भाजपा की पूरी नजर दिसंबर में होने वाले नगर निगम चुनावों पर होगी। हालांकि, राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज है कि बदली परिस्थितियों को देखते हुए चुनाव समय से पहले भी कराए जा सकते हैं। नतीजों के 72 घंटों के भीतर ही तृणमूल के भीतर आत्मसमर्पण और पलायन की स्थिति दिखने लगी है। 
पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं का मानना है कि स्थानीय स्तर पर व्याप्त सिंडिकेट संस्कृति, जबरन वसूली और पार्षदों की बढ़ती संपत्ति के प्रति जनता का आक्रोश ही इस करारी हार का कारण बना। कई पार्षदों ने नाम न छापने की शर्त पर स्वीकार किया है कि अब घर से निकलना मुश्किल हो गया है और कार्यकर्ताओं का मनोबल पूरी तरह टूट चुका है। कोलकाता के साथ-साथ विधाननगर, हावड़ा, चंदननगर और आसनसोल जैसे प्रमुख नगर निगमों में भी भाजपा का प्रदर्शन बेहद मजबूत रहा है। तृणमूल के वरिष्ठ नेताओं को डर है कि यदि जल्द ही संगठनात्मक सर्जरी नहीं की गई, तो दिसंबर के चुनाव में कोलकाता नगर निगम की सत्ता उनके हाथ से रेत की तरह फिसल जाएगी। एक पार्षद के शब्दों में कहें तो फिलहाल सवाल चुनाव जीतने का नहीं, बल्कि आने वाले महीनों में राजनीतिक अस्तित्व बचाने का है।

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