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पूर्व विधायक अघ्र्य राय प्रधान ने थामा भाजपा का दामन
कोलकाता। विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही राज्य में दल-बदल का खेल अपने चरम पर पहुँच गया है। उत्तर बंगाल की राजनीति में एक बड़ा धमाका करते हुए तृणमूल के कद्दावर पूर्व विधायक अर्घ्य राय प्रधान ने सत्ताधारी दल को अलविदा कहकर भाजपा का झंडा थाम लिया है। कोलकाता में आयोजित एक भव्य कार्यक्रम में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य और नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी की मौजूदगी में अघ्र्य राय प्रधान औपचारिक रूप से भगवा खेमे में शामिल हुए। उनके साथ ही ग्रेटर कूचबिहार आंदोलन के प्रमुख चेहरे और प्रभावशाली राजबंशी नेता बंशीबदन बर्मन ने भी भाजपा की सदस्यता ग्रहण की, जिसे उत्तर बंगाल के वोट बैंक में एक बड़ी सेंधमारी के तौर पर देखा जा रहा है। अघ्र्य राय प्रधान का भाजपा में जाना तृणमूल के लिए कूचबिहार जिले में एक बड़ी संगठनात्मक क्षति माना जा रहा है। अघ्र्य का राजनीतिक रसूख उनकी विरासत से भी जुड़ा है; उनके पिता अमर राय प्रधान फॉरवर्ड ब्लॉक के दिग्गज नेता और पांच बार के सांसद रह चुके हैं। अघ्र्य खुद 2011 में तुफानगंज और 2016 में मेखलीगंज सीट से विधायक रह चुके हैं। हालांकि, पिछले कुछ समय से पार्टी के भीतर उनकी अनदेखी और टिकट न मिलने के कारण उपजी नाराजगी इस अलगाव की मुख्य वजह बनी।
भाजपा में शामिल होते ही उन्होंने तृणमूल पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि वे ऐसे दल में दम घुटने जैसा महसूस कर रहे थे जहाँ भ्रष्टाचार के साथ समझौता करना पड़ता है। उन्होंने गर्व के साथ भाजपा के लिए काम करने और जनता के प्रति अपनी जवाबदेही निभाने का संकल्प दोहराया। इस घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू बंशीबदन बर्मन का भाजपा में शामिल होना है। राजबंशी समुदाय, जो उत्तर बंगाल की कई सीटों पर हार-जीत का फैसला करता है, उस पर बंशीबदन की गहरी पकड़ मानी जाती है।
बर्मन ने साफ किया कि राजबंशी समुदाय की अलग पहचान, भाषा और संस्कृति के संरक्षण के लिए केंद्र सरकार की नीतियां उन्हें प्रभावित कर रही हैं। भाजपा रणनीतिकारों का मानना है कि इन दो दिग्गजों के आने से कूचबिहार और आसपास के क्षेत्रों में पार्टी की स्थिति अभेद्य हो जाएगी। शुभेंदु अधिकारी ने इस मौके पर कहा कि तृणमूल के भीतर मची भगदड़ यह साबित करती है कि बंगाल की जनता और जमीन से जुड़े नेता अब बदलाव चाहते हैं। सियासी गलियारों में चर्चा है कि यह दल-बदल महज एक शुरुआत है। गौर करने वाली बात यह है कि महज़ एक दिन पहले ही कांग्रेस के वरिष्ठ नेता संतोष पाठक ने भी भाजपा का दामन थामा था। लगातार हो रहे इन घटनाक्रमों ने तृणमूल के भीतर बेचैनी बढ़ा दी है, खासकर उन क्षेत्रों में जहाँ विपक्ष पहले से ही मजबूत स्थिति में है। अर्घ्य राय प्रधान और बंशीबदन बर्मन की जोड़ी अब भाजपा के लिए उत्तर बंगाल में चुनावी ढाल और तलवार दोनों का काम करेगी। जैसे-जैसे 2026 की चुनावी जंग नजदीक आ रही है, बंगाल की राजनीति का केंद्र अब कोलकाता से हटकर उत्तर बंगाल के इन रणनीतिक जिलों की ओर मुड़ गया है। भाजपा ने स्पष्ट कर दिया है कि वह क्षेत्रीय क्षत्रपों और प्रभावशाली सामुदायिक नेताओं को साथ लेकर तृणमूल के गढ़ में सेंध लगाने की तैयारी पूरी कर चुकी है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि तृणमूल अपने इस गढ़ को बचाने के लिए क्या जवाबी रणनीति अपनाती है।