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वरिष्ठ लेखक डॉ. एस. आर. रामास्वामी का निधन, साहित्य और पत्रकारिता जगत को अपूरणीय क्षति

उनका पार्थिव शरीर आम जनता के अंतिम दर्शन आज दोपहर 12 बजे तक केंपेगौड़नगर स्थित राष्ट्रोत्थान परिषद के केशवशिल्प में रखा गया है। इसके बाद रुद्रभूमि में उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा।

10 Apr 2026

वरिष्ठ लेखक डॉ. एस. आर. रामास्वामी का निधन, साहित्य और पत्रकारिता जगत को अपूरणीय क्षति

बेंगलुरु। वरिष्ठ विद्वान-लेखक, नाडोज तथा राष्ट्रोत्थान परिषद के पूर्व अध्यक्ष एस. आर. रामास्वामी (88 वर्ष) का शुक््रवार सुबह बेंगलुरु के शंकरपुरम स्थित रंगराव रोड पर उनके निवास पर निधन हो गया। उनके निधन से कन्नड़ साहित्य और पत्रकारिता जगत को अपूरणीय क्षति हुई है।

उनका पार्थिव शरीर आम जनता के अंतिम दर्शन आज दोपहर 12 बजे तक केंपेगौड़नगर स्थित राष्ट्रोत्थान परिषद के केशवशिल्प में रखा गया है। इसके बाद रुद्रभूमि में उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा।

डॉ. एस. आर. रामास्वामी के निधन पर कर्नाटक पूर्व मुख्यमंत्री बी. एस. येदियुरप्पा, विपक्ष के नेता आर. अशोक और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष विजयेंद्र सहित अनेक गणमान्य व्यक्तियों ने गहरा शोक व्यक्त किया है।

पांच दशकों की सेवा

डॉ. रामास्वामी ने पांच दशकों तक पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया। पिछले 35 वर्षों से वे ‘उत्थान’ मासिक पत्रिका और ‘राष्ट्रोत्थान साहित्य’ प्रकाशन के प्रधान संपादक के रूप में कार्यरत थे। वर्ष 1972 से 1979 तक उन्होंने ‘सुधा’ साप्ताहिक पत्रिका में मुख्य उपसंपादक के रूप में भी सेवा दी।

साहित्य में विशिष्ट योगदान

उन्होंने सुभाष चंद्र बोस, जयप्रकाश नारायण, वल्लभभाई पटेल और मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया सहित अनेक महान व्यक्तित्वों की जीवनियां लिखीं। कुल मिलाकर उन्होंने लगभग 55 ग्रंथों की रचना की। ‘भारत में समाजकार्य’, ‘स्वतंत्रोदय के मील के पत्थर’, ‘आर्थिकता के दो ध्रुव’ और ‘शताब्दी के मोड़ पर भारत’ जैसी कृतियां समाज विज्ञान और अर्थशास्त्र के क्षेत्र में महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।

उनकी कृति ‘शताब्दी के मोड़ पर भारत’ को कर्नाटक साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उन्होंने धर्मपाल के ग्रंथों का कन्नड़ में अनुवाद कर भारतीय चिंतन को नई दिशा दी।

विचार और लेखन की विरासत

‘दीवटिगेगलु’, ‘सभ्यताओं का संघर्ष’, ‘कुछ ऐतिहासिक पर्व’ और ‘दीप्तिमंत’ जैसी कृतियों के माध्यम से उन्होंने समाज, इतिहास और संस्कृति के विविध पहलुओं का विश्लेषण किया। उन्होंने 1000 से अधिक शोधपरक लेख लिखकर समाजोन्मुख विचारों का प्रसार किया।

सम्मान और पुरस्कार

पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में योगदान के लिए उन्हें ‘आर्यभट्ट पुरस्कार’, कर्नाटक राज्य पुरस्कार, कर्नाटक मुक्त विश्वविद्यालय द्वारा मानद डॉक्टरेट तथा मिथिक सोसाइटी शताब्दी पुरस्कार सहित कई सम्मानों से नवाजा गया। वर्ष 2015 में कन्नड़ विश्वविद्यालय, हम्पी ने उन्हें प्रतिष्ठित ‘नाडोज’ उपाधि से सम्मानित किया।

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