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उन्होंने यह स्पष्ट करने की कोशिश की कि उनकी सरकार वैचारिक रूप से जितनी दृढ़ है, सांस्कृतिक रूप से उतनी ही माटी से जुड़ी है
कोलकाता। ब्रिगेड परेड ग्राउंड के ऐतिहासिक मंच पर जब शुभेंदु अधिकारी ने पश्चिम बंगाल के नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली, तो सबकी निगाहें उनके पारंपरिक और प्रतीकात्मक पहनावे पर टिक गईं। सफेद फुल शर्ट या पंजाबी पायजामे में दिखने वाले शुभेंदु ने इस खास मौके के लिए गेरुआ फतुआ और लाल पाड़ वाली सफेद धोती को चुना। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, मुख्यमंत्री का यह वेश महज एक चुनाव नहीं, बल्कि भाजपा की विचारधारा और बंगाली संस्कृति के अनूठे संगम का एक गहरा संदेश था।
शपथ ग्रहण के दौरान शुभेंदु के माथे पर लगा गेरुआ तिलक और आधी बांह का सादा फतुआ सीधे तौर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा की वैचारिक जड़ों से जुड़ाव को दर्शाता है। संघ के कार्यकर्ताओं के बीच सादा फतुआ सादगी और कर्तव्यनिष्ठा का प्रतीक माना जाता है। वहीं, सफेद धोती पर लाल किनारा बंगाली लोक-संस्कृति की पहचान है। इस पहनावे के जरिए शुभेंदु ने विपक्ष के उन आरोपों का मौन जवाब दिया, जिनमें भाजपा को बंगाली अस्मिता का विरोधी बताया जा रहा था। उन्होंने यह स्पष्ट करने की कोशिश की कि उनकी सरकार वैचारिक रूप से जितनी दृढ़ है, सांस्कृतिक रूप से उतनी ही माटी से जुड़ी है।
समारोह में मंत्रिमंडल के अन्य सहयोगियों ने भी वेशभूषा के जरिए इसी तालमेल को आगे बढ़ाया। दिलीप घोष जहां सादे सफेद कुर्ता-पायजामे में नजर आए, वहीं अग्निमित्रा पॉल ने लाल किनारी वाली सफेद साड़ी और भाजपा के दुपट्टे के साथ बंगाली परंपरा का परिचय दिया। निशीथ प्रमाणिक समेत अन्य नवनियुक्त मंत्रियों ने भी गेरुआ और पारंपरिक रंगों को प्राथमिकता दी।
शुभेंदु समर्थकों का मानना है कि चरैवेति (निरंतर चलते रहना) का मंत्र देने वाले मुख्यमंत्री की यह सादगी भरी वेशभूषा उनके जन-नेता होने के दावों को और मजबूती देती है। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि शपथ ग्रहण के इस मंच से भाजपा ने न केवल सत्ता संभाली है, बल्कि पहनावे के प्रतीकों के जरिए बंगाल की नई राजनीतिक और सांस्कृतिक दिशा भी तय कर दी है।