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मुकुल रॉय आखिर किस पार्टी में?

हाईकोर्ट में जनहित याचिका, राज्य सरकार ने उठाया याचिका की वैधता पर सवाल

19 Jun 2025

मुकुल रॉय आखिर किस पार्टी में?

कोलकाता। बंगाल की राजनीति में एक बार फिर मुकुल रॉय को लेकर विवाद गहरा गया है। मुकुल रॉय किस राजनीतिक दल में हैं, भाजपा में या तृणमूल में इस सवाल को लेकर हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई है। लेकिन अब इस याचिका की ग्रहणयोग्यता को लेकर भी सवाल उठ गए हैं। दरअसल, मुकुल रॉय विधानसभा की पब्लिक अकाउंट्स कमेटी (पीएसी) के चेयरमैन बनाए गए थे, जो परंपरागत रूप से विपक्षी दल के विधायक को दिया जाता है। मुकुल रॉय उस समय भाजपा के विधायक थे, लेकिन बाद में उन्होंने तृणमूल में सार्वजनिक रूप से वापसी की घोषणा की थी। तब यह सवाल उठा कि अगर वे तृणमूल में शामिल हो चुके हैं, तो क्या वे पीएसी चेयरमैन पद पर बने रह सकते हैं? इस मुद्दे को लेकर विधानसभा अध्यक्ष का कहना था कि मुकुल रॉय अब भी भाजपा विधायक हैं, और इसीलिए उनकी नियुक्ति वैध है। 
इस पर आपत्ति जताते हुए विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की, जिसमें उन्होंने मांग की कि अदालत यह स्पष्ट करे कि मुकुल रॉय किस पार्टी में हैं और पीएसी चेयरमैन पद पर उनकी नियुक्ति संविधान सम्मत है या नहीं। गुरूवार को इस मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से एडवोकेट जनरल किशोर दत्ता ने अदालत से कहा कि यह मामला विधानसभा अध्यक्ष के अधिकार क्षेत्र में आता है। कोर्ट को इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। पहले यह तय किया जाए कि क्या यह याचिका स्वीकार करने योग्य है। हालांकि, न्यायमूर्ति देबांशु बसाक की पीठ ने पूछा कि जब यह मामला मुख्य न्यायाधीश पहले ही सुनवाई के लिए निर्धारित कर चुके हैं, तब इसकी वैधता पर फिर से सवाल क्यों? इससे पहले भी हाईकोर्ट ने इस विवाद को निपटाने के लिए मामला विधानसभा अध्यक्ष के पास भेजा था। अध्यक्ष ने अपने पहले के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा था कि मुकुल रॉय अब भी भाजपा के विधायक हैं। इसी फैसले को चुनौती देते हुए फिर से हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई है। यह देखना दिलचस्प होगा कि हाईकोर्ट इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाता है? क्या अदालत विधानसभा अध्यक्ष के निर्णय की समीक्षा कर सकती है या नहीं? यह मामला केवल मुकुल रॉय की राजनीतिक पहचान का नहीं, बल्कि विधानसभा की स्वायत्तता बनाम न्यायिक दखल जैसे संवेदनशील मुद्दे को भी छू रहा है। अगर अदालत इस मामले में हस्तक्षेप करती है, तो भविष्य में विधायकों की दलगत स्थिति को लेकर कानूनी दृष्टिकोण और भी साफ हो सकता है।

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