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परवल 250 तो भिंडी 150 रु. किलो तक पहुंची
कोलकाता। मौसम के बदलते मिजाज ने आम आदमी की थाली का स्वाद बिगाडऩा शुरू कर दिया है। जैसे-जैसे सर्दी विदा हो रही है, बाजार से मौसमी सब्जियां गायब होने लगी हैं और उनकी जगह लेने वाली गर्मियों की सब्जियों के दाम आसमान छू रहे हैं।
आपूर्ति में कमी और मांग में बढ़ोतरी के कारण महज एक हफ्ते के भीतर सब्जियों की कीमतों में भारी उछाल आया है, जिससे मध्यम और निम्न आय वर्ग के परिवारों के लिए रसोई का बजट संभालना मुश्किल हो गया है। कुछ दिनों पहले तक जो फूलगोभी 20 से 30 रुपये जोड़ी मिल रही थी, उसकी कीमत अब बढ़कर 50 से 60 रुपये तक पहुंच गई है। इसी तरह, 20 रुपये किलो बिकने वाला टमाटर अब 40 से 50 रुपये के भाव पर बिक रहा है। बैंगन की कीमतों में भी जबरदस्त तेजी देखी जा रही है; जो बैंगन पिछले सप्ताह 30 रुपये किलो था, वह अब 60 रुपये के पार निकल गया है। हालांकि, आलू और पत्तागोभी अभी भी आम आदमी की पहुंच में बने हुए हैं, लेकिन इनके स्वाद में अब वह पहले वाली बात नहीं रही। बाजार में गर्मियों की नई सब्जियों की आवक तो शुरू हो गई है, लेकिन उनकी कीमतें चौंकाने वाली हैं। परवल की आपूर्ति बेहद कम होने के कारण इसकी कीमत 200 से 250 रुपये किलो तक पहुंच गई है। भिंडी भी पीछे नहीं है और 100 से 150 रुपये किलो के भाव पर बिक रही है। कटहल के लिए खरीदारों को 100 से 150 रुपये तक चुकाने पड़ रहे हैं। वहीं, सलाद के लिए जरूरी खीरा भी 80 से 100 रुपये किलो के बीच बना हुआ है।
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, यह संक्रमण काल सब्जियों के दाम बढऩे की मुख्य वजह है। सर्दियों की फसल खत्म हो रही है और गर्मियों की स्थानीय पैदावार अभी बाजार में पूरी तरह नहीं उतरी है। फिलहाल ज्यादातर सब्जियां दूसरे राज्यों से मंगाई जा रही हैं, जिससे परिवहन लागत और बिचौलियों के मुनाफे का बोझ सीधे ग्राहकों की जेब पर पड़ रहा है। तापमान बढऩे के साथ ही फूलगोभी और मटर जैसी सब्जियों का स्वाद फीका पडऩे लगा है, जिसके कारण लोग महंगी होने के बावजूद नई सब्जियों की ओर रुख कर रहे हैं। थोक विक्रेताओं का कहना है कि जब तक स्थानीय क्षेत्रों से भिंडी, परवल और अन्य गर्मियों की सब्जियों की आवक बड़े पैमाने पर शुरू नहीं होती, तब तक कीमतों में बड़ी राहत मिलने की उम्मीद कम है। अगले 15 से 20 दिनों तक बाजार का यही रुख रहने की संभावना है।
फिलहाल, आम आदमी अपनी रसोई को चलाने के लिए आलू और दाल के सहारे ही गुजारा करने को मजबूर है।
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