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बिजली जाने पर भी एक घंटे तक दौड़ेगी मेट्रो
कोलकाता। देश के कोने-कोने में इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में तेज गति से काम चल रहा है। रेल यातायात में गति लाने के लिए वंदेभारत ट्रेनें चलाई जा रही हैं वहीं सड़क परिवहन को बेहतर बनाने के लिए देशभर में एक्सप्रेस-वे की जाल बिछ रही है। अब राजधानी दिल्ली ही नहीं बल्कि देश के सभी प्रमुख शहरों में मेट्रो रेल या तो शुरू हो चुका है या फिर उन पर तेजी से काम चल रहा है। इन विकास कार्यों में रोज इंजीनियरिंग के क्षेत्र में नए-नए कीर्तिमान भी स्थापित किए जा रहे हैं। इसी तरह का एक कीर्तिमान देश के एक सबसे पुराने महानगर में हुआ है। यहां गंगा जैसी नदी की सतह से 118 फीट नीचे सुरंग बनाई गई है।
ईस्ट वेस्ट मेट्रो अत्याधुनिक तकनीक से लैश हैं जहाँ यात्रियों की सुरक्षा पर पूरी तरह से ध्यान दिया गया हैं। मेट्रो के दो कमरों को जोडऩे वाले स्थान को ज्यादा चौड़ा किया गया हैं तो वही मेट्रो के रेक को इस तरह से डिजाइन किया गया हैं कि बिजली गुल होने की स्थिति में भी एक घंटे तक मेट्रो एयर कंडीश्नर के साथ एक घंटे तक आसानी से दौड़ सकती हैं। इसके अलावा मेट्रो के प्रत्येक कोच में लैडर बाक्स दिया गया हैं जिसके जरीये आपात स्थिति में यात्रियों को गेट खोल कर लैडर के जरीये बाहर निकाल कर आपातकालिन दरवाजे से बाहर निकाला जा सकेगा। इसके आलावा भी सभी कोचों में मोबाइल और लैपटाप को चार्ज करने की व्यवस्था की गयी हैं साथ ही सुरक्षा के लिहाज से पूरे कोच को सीसीटीवी कैमरों से लैश किया गया हैं जिसका सीधा प्रसारण ना केवल मेट्रो के चालक के पास होगा बल्कि कंट्रोल रूम में भी दिखाई पड़ेगा। इसके अलावा किसी भी आपात परिस्थिति के दौरान यात्री सीधे चालक से संपर्क कर सकते हैं इसके लिये सेंसर बटन लगाया गया हैं।
ईस्ट वेस्ट मेट्रो का हावड़ा स्टेशन देश का सबसे गहरा मेट्रो स्टेशन बन गया हैं। अभी तक दिल्ली मेट्रो का चावड़ी बाजार मेट्रो स्टेशन सबसे गहराई में था। यह करीब 28 मीटर जमीन के नीचे है, लेकिन हावड़ा मेट्रो स्टेशन करीब 33 मीटर यानी 108 फीट जमीन के अंदर है। यानी 11 मंजिली इमारत की ऊंचाई के बराबर गहराई में यह मेट्रो स्टेशन बनाया गया है, जो देश का सबसे गहराई में बना मेट्रो स्टेशन है। इसके अलावा इसमें दोनों ओर प्लेटफार्म बनाए गए हैं, जिससे दोनों ओर से पैसेंजर चढ़ और उतर सकें। मेट्रो का निर्माण करने वाले इंजीनियरों ने बताया कि गंगा के नीचे से मेट्रो दौड़ाने के लिये इसकी डिजाइनिंग व प्लानिंग में 360 दिन लगे और केवल 66 दिन में टनल बनकर तैयार हो गई। 12 मंजिली इमारत के बराबर ( 36 मीटर) गहराई में बनी टनल में ट्रैक भी बिछा दिया गया। टनल को 120 साल आगे को ध्यान में रखते हुए डिजाइन किया गया है। चूंकि देश में पहली बार पानी के अंदर टनल बनानी थी, इसलिए ऐसी मशीन की जरूरत थी, जो ऊपर से पडऩे वाले पानी के प्रेशर को सहन कर ले और निर्माण के दौरान पानी के रिसाव को भी रोके। इससे पहले देश के कई शहरों में टनल बनी है लेकिन वहां पानी आने का खतरा नहीं था, इसलिए सामान्य मशीन से सुरंग बन जाती थी। टीबीएम यानी टनल बोरिंग मशीन में जर्मनी को महारथ हासिल है।
कोलकाता मेट्रो ने जर्मनी से अपनी जरूरत के अनुसार मशीन डिजाइन कराई। इस मशीन की खासियत यह थी कि मिट्टी काटने के साथ-साथ निर्मित हिस्से को सील करती जाती थी। इससे अगर कटिंग के दौरान पानी आता तब भी तैयार हो चुके टनल के हिस्से में नहीं जाता। टनल में बाद में भी कभी पानी न आए, इसके लिए पहली बार ज्वाइंट में हाइड्रोफिलिक गास्केट का इस्तेमाल किया गया, जो पानी के संपर्क में आते ही 10 गुना अधिक फैल जाएगा, यानी पानी के संपर्क में आते ही पहले से ज्यादा वाटर प्रूफ हो जाएगा। हुगली के नीचे बनी सुरंग की लंबाई 520 मीटर और ऊंचाई 6 मीटर है।