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कॉम्पैक्टर स्टेशन की वजह से तेजी से घट रही है कौओं की संख्या

भोजन की कमी के कारण नहीं हो रहा है प्रजनन

02 Nov 2024

कॉम्पैक्टर स्टेशन की वजह से तेजी से घट रही है कौओं की संख्या

कोलकाता। कोलकाता महानगर में अब लोमड़ी, चमगादड़, टिड्डे, तितलियाँ दिखाई नहीं देतीं। इस बार उस लिस्ट में जुडऩे जा रहा है कौवे का नाम।पर्यावरणविदों का कहना है कि कुछ साल पहले तक कोलकाता महानगर में बड़ी संख्या में कौवे देखे जाते थे।लेकिन अब शहर में पहले की तरह कौवे नजर नहीं आते।इसके लिए वे शहर के बदलते माहौल और कुछ उन्नत तकनीक को कारण मान रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि कोलकाता के अधिकांश हिस्सों से ओपन वैट लगभग हटा दिए जाने के बाद से कौवों की संख्या में तेजी से गिरावट आ रही है। एक समय में कौवों के झुंड खुले हौदों से भोजन इक_ा करते थे। अब नगर निगम के अधिकांश वार्डों में वैट माफ कर कॉम्पैक्टर स्टेशन स्थापित कर दिये गये हैं।घर से कूड़ा एकत्र करने के बाद उसे कॉम्पेक्टर स्टेशन में जमा किया जाता है। वहां से खाना चुराने का मौका नहीं मिलता। इसीलिए कुछ लोगों को अपने भोजन को लेकर कठिनाई हो रही है।

पश्चिम बंगाल स्टेट यूनिवर्सिटी (बारासात) में जूलॉजी के प्रोफेसर और कौवा विशेषज्ञ शिलंजन भट्टाचार्य कहते हैं कि कौवे आम तौर पर दो प्रकार के होते हैं। पत्ती कौआ (कोरवस स्प्लेंडेंस) और रेवेन (कोरवस मैक्रोरहाइन्चोस)। लीफ कौवे मुख्यत: शहरी निवासी होते हैं। जहां बहुत सारा कूड़ा-कचरा खुला रहता है, वहां वे भोजन इक_ा करते हैं। लेकिन कोलकाता की सड़कों से वैट लगभग हटा दिए जाने से उन्हें पहले जैसा भोजन नहीं मिल रहा है। कोलकाता में कौवों की संख्या में गिरावट के पीछे यह एक बड़ा कारण है। खड़ा कौआ मुख्यत: जंगलों में रहता है। वे शिकार को पकड़कर खाते हैं। उनके आहार में साँप, पक्षी के अंडे, गिरगिट शामिल हैं। गाँव की ओर पेड़ों की अधिकता के कारण वहाँ कौवे अधिक खड़े दिखाई देते थे। लेकिन गांव की ओर पेड़ों को काटकर कई घर और फैक्ट्रियां बनाई जा रही हैं। 
नतीजा यह हुआ कि गांवों में अब खड़े कौवे नजर नहीं आते। शिलंजन कहते हैं, कौवे बुद्धिमान पक्षी हैं। जब भी उन्हें खाने की दिक्कत होती है तो वे कहीं और तलाश करते हैं। हालाँकि, अगर भोजन और आश्रय इसी तरह से कम होते रहे, तो पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव पडऩा तय है। यदि आश्रय नहीं मिला तो कौवों का प्रजनन कम हो जायेगा। फलस्वरूप इनकी संख्या धीरे-धीरे कम होती जायेगी।
पर्यावरणविद बनानी कक्कड़ के मुताबिक कोलकाता में जब से खुले हौद ऊपर गए और कॉम्पेक्टर मशीनें बैठने लगीं, तब से शहर में कौवों की संख्या कम होने लगी है। कौवे बड़े-बड़े पेड़ों पर अपना घोंसला बनाते थे। नगर पालिका पेड़ों की शाखाएं इसलिए काट रही है क्योंकि इससे नागरिकों को असुविधा होगी। परिणामस्वरूप वे घोंसला नहीं बना पाते। थापा के आसपास बहुत सारे कौवे नजर आते थे। अब उन्हें नहीं देख सकता। भविष्य में कौवे कोलकाता से हमेशा के लिए गायब हो सकते हैं। 
कोलकाता नगर निगम पार्क विभाग के मेयर परिषद देबाशीष कुमार ने कहा कि आयला और अमफान तूफान के कारण शहर में कई बड़े पेड़ नष्ट हो गए हैं। इसलिए हम नये पेड़ लगा रहे हैं। हम पक्षियों के बारे में सोचकर फलदार पौधे भी लगा रहे हैं। शहर को साफ-सुथरा रखने के लिए ओपन वैट हटा दिया गया है और कॉम्पेक्टर मशीनें लगायी गयी हैं। इसके लिए विशेषज्ञ ही बता सकते हैं कि कौवों की संख्या कम हो रही है या नहीं। अब कौवों के लिए खुली टंकी नहीं रखी जा सकती। पर्यावरणविदों की माने तो कोलकाता में तेजी से घटते पेड़ों के कारण कौवे घोषला नहीं बना पा रहे हैं, जिसके कारण उनकी प्रजनन भी पहले की अपेक्षा कम हो गयी है। अगर इसी प्रकार कौओं की संख्या में गिरावट आती रही तो यह निकट भविष्य के लिए खतरा हो सकता है। 

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