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औद्योगिक कचरे पर नियंत्रण के साथ कीटनाशकों और रसायनों को गंगा में गिरने से हर कीमत पर रोका जाना चाहिए
कोलकाता। काफी समय से हावड़ा ब्रिज कोलकाता, हावड़ा और हुगली नदी की पहचान बना हुआ है। ब्रिज की खूबसूरती नदी में और नदी की खूबसूरती ब्रिज में है। गंगा की ही धारा हुगली नदी को आप दोनों शहरों कोलकाता और हावड़ा की लाइफलाइन कह सकते हैं। लेकिन कूड़े और नालों की गंदगी से इस 'लाइफलाइनÓ का खुद ही जीना मुहाल हो गया है। गंगा अपने आखिरी पड़ाव में बंगाल की खाड़ी में समाहित होने से पहले सुंदरबन डेल्टा से पश्चिम बंगाल में प्रवेश करती है।
यही वजह है कि यहां नदी में गंदगी का स्तर सबसे ज्यादा है। पश्चिम बंगाल में 222 बड़े और छोटे नाले अपने साथ तमाम गंदगी गंगा में गिराते हैं। भारत के महानगरों में से एक कोलकाता के लोगों को एक चिंता सता रही है। हुगली नदी के किनारों पर कटाव हो रहा है जिससे लोगों को पीछे हटना पड़ रहा है। हुगली नदी के कटाव से वहां के लोग काफी चिंतित हैं। हुगली नदी के तट कई स्थानों पर कटाव के कारण क्षतिग्रस्त हो गए हैं, जिससे नदी का पानी गहरा हो गया है और लगभग भूमि तक पहुंच गया है। कई घाटों का भी हिस्सा बह गया है और किनारों के कुछ हिस्सों में दरारें पड़ गई हैं, वे ढह गए हैं और नदी में गिर गए हैं।
बड़ाबाजार सर्कुलर रेलवे स्टेशन के पास स्ट्रैंड बैंक रोड पर स्थित एक गोदाम के मालिक ने बताया कि महालया से कुछ दिन पहले उनके गोदाम के पीछे तटबंध का एक हिस्सा नदी में गिर गया था। कुछ महीने पहले, कोलकाता में रतन बाबू घाट के पास सड़क धंसने लगी थी और जब कोलकाता नगर निगम (सीएमसी) द्वारा मरम्मत कार्य अपर्याप्त साबित हुआ, तो नगर निगम ने राज्य सिंचाई विभाग को पत्र लिखकर मदद मांगी हैं। एक नदी वैज्ञानिक ने कटाव की बढ़ती दर के लिए प्राकृतिक हरियाली के विनाश के साथ-साथ तटों पर अतिक्रमण को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि हालांकि यह एक प्राकृतिक घटना है, लेकिन मानवीय गतिविधियों ने नदी के किनारे कटाव को तेज करने में मदद की है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि किस तरह कूड़ा करकट, रसायन और कीटनाशक गंगा को प्रदूषित कर रहे हैं। भारत सरकार और नगर निकायों की ओर से करोड़ों रुपए खर्च किए जाने के बाद भी ग्राउंड जीरो पर स्थिति बेहतर होती नजर नहीं आ रही। इस रिपोर्टर की ओर से नदी के घाट पर दुर्गा पूजा उत्सव को 2005 से ही कवर किया जा रहा है। तब से अब में स्थिति में काफी बदलाव आया है। अब सिर्फ सांस्कृतिक आस्था के चलते ही प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाता है। लेकिन मूर्तियों को विसर्जित करते समय उसके साथ की सारी सामग्री को पहले हटा लिया जाता है। लेकिन ये सिर्फ दुर्गा पूजा उत्सव के दौरान किया जाता है जब दोनों शहरों में करीब 5000 प्रतिमाओं को विसर्जित किया जाता है। लेकिन पूरे साल चलने वाले छोटे पूजा उत्सवों पर सख्ती नहीं होने की वजह से नियमों का पालन नहीं किया जाता। पर्यावरण कार्यकर्ता सुभाष दत्ता कई मुहिम चला चुके हैं लेकिन मानते हैं कि गंगा को स्वच्छ बनाने का लक्ष्य बहुत दूर की बात है।
दत्ता के मुताबिक, समाधान ये है कि गंगा में हर जगह सीवेज के पानी को बिना ट्रीट हुए गिरने से रोका जाए। इसके लिए बड़े पैमाने पर सीवेज ड्रेनेज सिस्टम बनाए जाने की जरूरत है। समाधान सिर्फ बंगाल तक ही सीमित नहीं हो सकता। समाधान की दिशा में गंगा के उद्गम स्थल से लेकर अंत तक काम होना चाहिए। गंगा के पास 80 छोटे-बड़े शहर, करीब 1000 गांव बसे हुए हैं। ड्रेनेज सीवेज सिस्टम गंगा के दोनों किनारों पर बनाए जाने की जरूरत है। औद्योगिक कचरे पर नियंत्रण होना चाहिए। गंगा के किनारे कूड़ा नहीं जमा होने देना चाहिए। ये वो मुद्दे हैं जिन पर तत्काल ध्यान दिए जाने की जरूरत है। यहां सबसे प्रसिद्ध बाबू घाट है। यहां जगह जगह गंदगी के अंबार आसानी से दिखाई पड़ जायेगा। पूरे घाट पर पुनरूद्धार का काम बेशक चल रहा हो लेकिन यहां कूड़े के पहाड़ किसी की नजर से बच नहीं सकते। सीधा अर्थ है कि कोलकाता हाईकोर्ट ने जो निर्देश दे रखे हैं उनका दुर्गा पूजा जैसे बड़े दिनों पर तो पालन किया जाता है लेकिन साल के और दिनों में इनकी अनदेखी ही रहती है।
जादवपुर यूनिवर्सिटी में समुद्री अध्ययन स्कूल के डायरेक्टर और प्रोफेसर डॉ. सुगाता हाजरा ने बताया कि बंगाल के उत्तरी हिस्से में गंगा सबसे ज्यादा प्रदूषित है। यहां प्रति लीटर फेकल कोलिफॉर्म बैक्टीरिया 160,000 से ज्यादा है। हर दिन बड़ी मात्रा में बिना ट्रीट किया हुआ सीवेज का पानी गंगा में मिलता है। ऐसे में गंगा का पानी पीने के लिए तो दूर नहाने के लिए भी इस्तेमाल करना खतरे से खाली नहीं है। ये हावड़ा और कोलकाता के लोगों के लिए गंभीर बात है। औद्योगिक कचरे पर नियंत्रण के साथ कीटनाशकों और रसायनों को गंगा में गिरने से हर कीमत पर रोका जाना चाहिए। इसे सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। नहीं तो ये पीने के पानी के संकट को सिर्फ बंगाल में ही नहीं पूरे देश में न्योता देने जैसा है। वो नदी, जिसे राज्य की लाइफलाइन कहा जाता है, उसमें प्रदूषण की वजह से राज्य का भविष्य अंधकार में नजर आता है।