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मेयर-इन-काउंसिल के सदस्य स्वपन समद्दर ने कहा कि हमने लगभग एक महीने पहले हेरिटेज कंजर्वेशन कमेटी से घर को हेरिटेज टैग देने की अपील की है
कोलकाता। 48ए कैलाश बोस स्ट्रीट कोलकाता। इस पते वाले घर के लिए हेरिटेज टैग की मांग की गई है। कोलकाता नगर निगम में आवेदन हो चुका है। इस पर कार्रवाई शुरू हो गई है। अचानक इस घर के हेरिटेज टैग की मांग पर यह मकान चर्चा में आ गया है। दरअसल वही घर है, जहां देश का पहला विधवा पुनर्विवाह हुआ था।
कोलकाता नगर निगम (केएमसी) इस घर को बचाने के लिए काम कर रहा है। वे चाहते हैं कि लोग इस घर को याद रखें। यह घर ईश्वर चंद्र विद्यासागर के सामाजिक सुधार आंदोलन की निशानी है। यह आंदोलन 160 साल पहले इसी घर में हुआ था। विद्यासागर के प्रयासों से ब्रिटिश सरकार ने 16 जुलाई 1856 को हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम पारित किया था। यह घर राजकृष्ण बनर्जी का था। राजकृष्ण, विद्यासागर के अच्छे दोस्त थे। विद्यासागर अक्सर उनके घर दोपहर का भोजन करने जाते थे। 7 दिसंबर 1856 को इस दो मंजिला घर में एक युवा विधवा का पुनर्विवाह हुआ। इस तरह यह घर कानूनी रूप से विधवा पुनर्विवाह का पहला गवाह बना। विद्यासागर ने खुद इस समारोह का आयोजन किया था। भारत की जिस पहले विधवा का पुनर्विवाह हुआ था, उस दुल्हन का नाम कालीमती देवी था। वह ब्रह्मानंद मुखर्जी और लछमनी देवी की बेटी थीं। वह पुर्व बर्धमान के पलाशडांगा गांव से थीं। दूल्हे का नाम श्रीशचंद्र विद्यारत्न था। वे संस्कृत कॉलेज में सहायक प्रोफेसर थे। उनके पिता का नाम पंडित रामधन तर्कबागीश था। कालीमती की पहली शादी चार साल की उम्र में हुई थी। छह साल की उम्र में वह विधवा हो गई थीं।
मेयर-इन-काउंसिल के सदस्य स्वपन समद्दर ने कहा कि हमने लगभग एक महीने पहले हेरिटेज कंजर्वेशन कमेटी से घर को हेरिटेज टैग देने की अपील की है। अगर ऐसा होता है तो यह बहुत खुशी और गर्व की बात होगी। यह घर ऐतिहासिक महत्व और सामाजिक परिवर्तन का प्रतीक है। दुख की बात है कि यह इतने सालों से अनदेखा रहा। आज यह पुराना घर ज्यादातर खाली और शांत रहता है। इसके चारों ओर जंगली पौधे उग रहे हैं और भूतल पर धातु के शटर लगे हुए हैं। लकड़ी की खिड़कियों और टिन की छत वाला यह बंगाली शैली का भवन जर्जर दिखता है। इसकी पीली दीवारों से पेंट निकल गया है। लोहे की रेलिंग जंग खा रही हैं। इस मकान में कोई नहीं रहता। सिर्फ एक नौकरानी, एक पुजारी और एक सुरक्षा गार्ड इसकी देखभाल करते हैं। घर के मालिक कोलकाता से बाहर रहते हैं और साल में एक या दो बार आते हैं। घर को तीन अलग-अलग हिस्सों में बांटा गया है। 1983 से, पीछे का हिस्सा सर्व भारतीय संगीत-ओ-संस्कृति परिषद के स्वामित्व में है। इसका प्रवेश द्वार जादवनाथ सेन लेन पर है। सामने दो भाग हैं, दाहिना भाग (48ए) राज कृष्ण बनर्जी के वंशजों के स्वामित्व में है, जबकि बायां भाग (48बी) पिछले एक दशक में नए मालिकों के पास चला गया है।