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मां दुर्गा, मां काली से शुरू किया मोदी ने अपना भाषण
दुर्गापुर। दुर्गापुर की जनसभा से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बंगाल में भाजपा की रणनीति में बड़ा बदलाव साफ कर दिया। अब पार्टी की राजनीति में राम के बजाय काली और दुर्गा को आगे रखकर बंगीयकरण की नई लकीर खींची जा रही है। मोदी ने अपने भाषण की शुरुआत 'जय श्रीरामÓ की जगह बंगाली में मां काली-मां दुर्गा कहकर की। साथ ही बंगाल की संस्कृति और अस्मिता को बार-बार अपने संबोधन में उठाया। प्रधानमंत्री ने मंच पर आते ही बंगाली में कहा कि बड़ोरा आमार प्रणाम नेबेन, छोटोरा भालोबाशा यानी बड़ों को मेरा प्रणाम, छोटों को स्नेह। इसके बाद उन्होंने जय मां काली, जय मां दुर्गा कहकर उन्होंने रैली की शुरुआत एक खांटी बंगाली की तरह की, और पूरे भाषण में कई बार बंगाली शब्दों का प्रयोग किया।
मोदी ने अपने भाषण में बंगाल को 'प्रेरणा का स्रोत' बताते हुए कादंबिनी गांगुली, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और डॉ. विधानचंद्र रॉय जैसे प्रतिष्ठित बंगाली व्यक्तित्वों को याद किया। साथ ही उन्होंने ये भी याद दिलाया कि द्रुपदी भाषा का दर्जा बंगाली को उनकी ही सरकार के दौरान मिला। अब तक भाजपा रैलियों में 'जय श्रीराम' नारे की गूंज आम बात थी, लेकिन दुर्गापुर की इस सभा में राम नाम पूरी तरह नदारद रहा। विश्लेषकों का मानना है कि यह बदलाव बंगाल की जमीन पर भाजपा की छवि सुधारने की रणनीति का हिस्सा है।
दरअसल, राज्य में भाजपा की पहचान 'बाहरी पार्टी', 'हिंसक हिंदुत्व' और 'बंगाली विरोधी' रूप में बनती जा रही थी जिसे तृणमूल कांग्रेस बार-बार उठाती रही है।
मोदी के इस बदले रुख को लेकर तृणमूल कांग्रेस ने चुटकी ली है। कुणाल घोष ने इसे लेकर कहा कि मोदी बंगाल में भाषण तो बंगाली में दे रहे हैं, पर क्या अब उन्हें डिटेंशन सेंटर में भी जाना पड़ेगा? साथ ही यह सवाल भी उठाया गया कि अगर बंगालियों पर अन्य राज्यों में हमले हो रहे हैं, तो मोदी ने इस पर चुप्पी क्यों साधी? बंगाल में रामनाम से अब वोट नहीं बढ़ रहे, यह भाजपा शायद समझ चुकी है। मां काली और दुर्गा के नाम का सहारा लेकर पार्टी अब स्थानीय संस्कृति से जुडऩे की कोशिश कर रही है। मोदी ने यह जताने की कोशिश की है कि भाजपा बंगालियों की अस्मिता का सम्मान करती है। दुर्गापुर की रैली ने स्पष्ट कर दिया कि बंगाल में भाजपा अब 'राष्ट्रवाद' से ज्यादा 'बंगालवाद' के रास्ते पर चलना चाहती है। मां काली और मां दुर्गा के नाम की जय के साथ शुरू हुआ मोदी का भाषण इसी दिशा में एक प्रतीकात्मक लेकिन निर्णायक कदम माना जा रहा है।