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मप्र के भोपाल में मेफेड्रोन फैक्टरी का पर्दाफाश, दाऊद गिरोह से जुड़े नेटवर्क का खुलासा

मेफेड्रोन बनाने की फैक्टरी का पर्दाफाश किया है। इसमें दाऊद गिरोह से जुड़े नेटवर्क के जुड़े होने के बारे में कई अहम जानकारियां मिली ह्रैं।

18 Aug 2025

मप्र के भोपाल में मेफेड्रोन फैक्टरी का पर्दाफाश, दाऊद गिरोह से जुड़े नेटवर्क का खुलासा

भोपाल। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल की हुजूर तहसील में राजस्व खुफिया निदेशालय (डीआरआई) की मुंबई इकाई ने

मेफेड्रोन बनाने की फैक्टरी का पर्दाफाश किया है। इसमें दाऊद गिरोह से जुड़े नेटवर्क के जुड़े होने के बारे में कई अहम जानकारियां मिली ह्रैं।

भोपाल की हुजूर तहसील में डीआरआई की मुंबई इकाई ने बताया कि जगदीशपुर इलाके में संचालित हो रही इस फैक्टरी में पिछले कुछ महीनों से मेफेड्रोन का अवैध उत्पादन किया जा रहा था। डीआरआई की मुंबई इकाई ने कार्रवाई करते हुए तीन लोगों को गिरफ्तार किया है। डीआरआई टीम

की पूछताछ में कई चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। एक अधिकारी ने बताया कि जाँच अभी जारी है और कई अन्य लोगों से पूछताछ की जा रही है, जिनके तार सीधे-सीधे इस सिंडिकेट से जुड़े हैं। इसमें दाऊद इब्राहिम के नेटवर्क से जुड़े लोग सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

डीआरआई अधिकारियों के अनुसार पूछताछ में सामने आया कि नशीले पदार्थ बनाने के लिए आवश्यक कच्चा माल भिवंडी से भेजा जाता था। यह सप्लाई सीधे तुर्की में बैठे सलीम डोला के निर्देश पर की जा रही थी। आरोपितों ने कबूल किया कि मार्च से जुलाई 2025 के बीच लगभग 400 किलो कच्चा माल भोपाल फैक्टरी में भेजा गया। अधिकारियों ने बताया कि इसमें “2 ब्रोमो 4 मिथाइल प्रोपियोफेनोन” जैसे रसायनों की बड़ी मात्रा शामिल थी। सप्लाई चेन का जिम्मा महाराष्ट्र के भिवंडी और ठाणे इलाके से जुड़े स्थानीय नेटवर्क के पास था।

डीआरआई की पूछताछ में वीरेन शाह नामक आपूर्तिकर्ता का नाम भी सामने आया, जो कथित तौर पर हर महीने बड़ी मात्रा में यह रसायन भेज रहा था। मार्च में 50 किलो, अप्रैल में 100 किलो, मई में 50 किलो, जून और जुलाई में 100-100 किलो की खेप भोपाल पहुंची थी। यह पूरा कारोबार बिना किसी बिल और रसीद के चल रहा था ताकि किसी भी एजेंसी को शक न हो। अधिकारियों ने बताया कि इसके लिए जाली दस्तावेज तैयार किए जाते थे और तय कमीशन बाजार मूल्य से करीब 2000 रुपये प्रति किलो अधिक रखा गया था।

इस मामले की तह तक पहुंचते हुए एजेंसी ने पाया कि फरवरी 2025 में सलीम इस्माइल डोला ने सीधे तौर पर सिंडिकेट के एक सदस्य को फोन कर रसायन खरीदने का सौदा तय किया था। यह सौदा इतना बड़ा था कि इसमें मोटी रकम की पेशकश की गई थी। पूछताछ में अजहरुद्दीन इदरीसी नामक व्यक्ति ने खुलासा किया कि अशरफ रेन ने उसे आर्थिक लाभ का लालच देकर भिवंडी और ठाणे से भोपाल तक कच्चा माल पहुंचाने का काम सौंपा था। उसे अंजुर फाटा इलाके से रसायन इकट्ठा कर मिनी ट्रक में भोपाल ले जाने के निर्देश दिए गए थे।

एक अधिकारी ने बताया कि डोला के संपर्क केवल भारत तक सीमित नहीं हैं। उसके तुर्की से लेकर दक्षिण अफ्रीका और मेक्सिको तक फैले कनेक्शन हैं। यही कारण है कि उसका नेटवर्क भारतीय एजेंसियों के लिए लगातार चुनौती बना हुआ है।

नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) ने इस साल जुलाई में सलीम इस्माइल डोला की सूचना देने वाले को एक लाख रुपये का इनाम घोषित किया था। डोला को मेफेड्रोन और अन्य सिंथेटिक ड्रग्स के कारोबार में विशेषज्ञ माना जाता है। पिछले कुछ वर्षों में मेफेड्रोन की खपत तेज़ी से बढ़ी है और यह नशीला पदार्थ प्रवर्तन एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। डोला का आपराधिक रिकॉर्ड पुराना है। साल 1998 में उसे मुंबई हवाई अड्डे पर 40 किलोग्राम मैंड्रेक्स के साथ पकड़ा गया था। बाद में उसने दाऊद इब्राहिम के नेटवर्क के लिए काम करना शुरू किया और अब उसे सलीम मिर्ची की जगह लेने वाला माना जा रहा है, जो पहले डी कंपनी के लिए नशीले पदार्थों का कारोबार देखता था।

वर्तमान में डोला तुर्की में छिपा हुआ है, जहाँ से उसे भारत लाना आसान नहीं है। हालांकि उसके बेटे ताहिर को 13 जून को और उसके भतीजे मुस्तफा मोहम्मद कुब्बावाला को 11 जुलाई को संयुक्त अरब अमीरात से भारत लाया जा चुका है। यह प्रत्यर्पण पारस्परिक कानूनी सहायता संधि (एमएलएटी) और इंटरपोल ढांचे के तहत संभव हुआ।

भोपाल में फैक्टरी का खुलासा कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले मंदसौर और बागरोदा इलाके में भी नशीले पदार्थों के अवैध कारोबार के मामले सामने आ चुके हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि मध्य प्रदेश का भौगोलिक स्थान, सड़कों और ट्रांसपोर्ट नेटवर्क की उपलब्धता, ड्रग माफिया को यहाँ काम करने में मदद करता है। यही कारण है कि यह राज्य लगातार ड्रग नेटवर्क का अड्डा बनता जा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि नशीले पदार्थों के धंधे पर रोक लगाने के लिए केवल छापेमारी और गिरफ्तारियाँ ही पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि इसके लिए मजबूत कानूनी ढाँचे और अंतरराज्‍यीय एवं अंतरराष्ट्रीय सहयोग की परस्‍पर ज़रूरत है। फिलहाल भोपाल की फैक्टरी का पर्दाफाश होने को भारतीय एजेंसियों के लिए एक बड़ी सफलता मानी जा रही है।

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