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हम सरकार से अपील करेंगे कि टैक्सी चालकों और उनके परिवारों को बचाने के लिए वैकल्पिक रोजगार की व्यवस्था की जाए
कोलकाता। नई मेट्रो सेवाओं की शुरुआत होते ही बस मालिकों की चिंता बढ़ गई है। हावड़ा से सॉल्टलेक सेक्टर 5, कवि सुभाष से हेमंत मुखोपाध्याय होते हुए बेलघरिया और नोआपाड़ा से जय हिंद (एयरपोर्ट) तक तीन नए मेट्रो रूट खुलने के बाद से सरकारी और प्राइवेट बसों में यात्रियों की संख्या घटने लगी है। खासकर हावड़ा से सीआलदह तक चलने वाली बसों पर असर साफ़ दिख रहा है।
सिटी सबर्बन बस सर्विस के एक पदाधिकारी टिटु साहा ने बताया कि हावड़ा से 28 और 71 नंबर रूट (सीआलदह और सॉल्टलेक) पर रोज़ाना औसतन 500 से 1000 रुपए तक की आय कम हो रही है। पहले इन रूटों की बसें रोज़ 7,500 से 9,000 रुपए तक कमाती थीं। वहीं बागुईआटी से हावड़ा तक 44 नंबर रूट की बसों में रोज़ करीब 200 से 500 रुपए का घाटा दर्ज हो रहा है। एक बस चालक के मुताबिक दिनभर चार चक्कर लगाने के बावजूद अब हर ट्रिप में 50 से 100 यात्रियों की कमी हो रही है। अगर यात्रियों को रोकना है तो हमें सेवा को और तेज़ करना होगा। शायद भविष्य में 72 नंबर रूट को बदलकर उल्टाडांगा से सॉल्टलेक तक बढ़ाया जाएगा।
बस मालिकों का कहना है कि जो लोग पहले 10 रुपए किराया देकर थोड़ी दूरी की यात्रा भी बस से करते थे, वे अब मेट्रो पकड़ रहे हैं। हालांकि बड़ा बाज़ार और कॉलेज स्ट्रीट जाने वालों की संख्या में अभी खास बदलाव नहीं आया है। टिटु साहा ने बताया कि बस मालिक अब रूट बदलने पर विचार कर रहे हैं और जल्द ही रीजनल ट्रांसपोर्ट ऑफिस से इस मुद्दे पर चर्चा करेंगे। उन्होंने कहा कि हम मेट्रो से सीधी प्रतिस्पर्धा नहीं करना चाहते। बल्कि मेट्रो को पूरक सेवा देना चाहते हैं। कोशिश यही होगी कि ऐसे रूट तय किए जाएं, जिससे यात्री सीधे मेट्रो स्टेशनों तक पहुँच सकें। दिलचस्प यह है कि सभी रूटों पर असर समान नहीं है। न्यू टाउन से हावड़ा तक चलने वाले एस-12 रूट और सॉल्टलेक से हावड़ा तक की 215ए रूट की बसों में यात्रियों की संख्या में खास कमी दर्ज नहीं हुई है। कोलकाता पुलिस और परिवहन विभाग भी स्थिति से अवगत हैं। विभाग ने बस मालिकों को भरोसा दिलाया है कि नए रूट की अनुमति के आवेदन आने पर इस पर गंभीरता से विचार किया जाएगा।
वहीं कभी शहर की सड़कों पर दौड़ती पीली टैक्सी कोलकाता की शान और पहचान मानी जाती थी। लेकिन अब मेट्रो नेटवर्क के विस्तार और ऐप आधारित कैब सेवाओं की बढ़ती लोकप्रियता ने इस पारंपरिक परिवहन साधन को अस्तित्व के संकट में डाल दिया है। सोमवार से हावड़ा, सियालदह और हवाई अड्डे तक मेट्रो सेवा शुरू होने के बाद पीली टैक्सी का अंतिम सहारा भी लगभग खत्म हो गया। अब तक इन स्थानों से यात्रियों की अच्छी संख्या टैक्सियों का सहारा लेती थी, लेकिन मेट्रो के कम खर्च, आरामदायक एसी सुविधा और तेज सफर ने यात्रियों को आकर्षित कर लिया है। टैक्सी चालकों का कहना है कि ऐप कैब्स आने के बाद से ही उनकी आमदनी घटने लगी थी। यात्रियों को एसी सुविधा और ऐप पर कहीं भी कैब बुक करने की सुविधा मिलती है, जबकि पीली टैक्सियों की छवि किराए में अनियमितता, पुराने वाहन, टूटे शीशे और बिना एसी जैसी समस्याओं से खराब होती चली गई।
टैक्सी संगठनों के मुताबिक, पहले शहर में हजारों पीली टैक्सी चलती थी, लेकिन अब इनकी संख्या घटकर केवल साढ़े तीन से चार हजार रह गई है। दिसंबर में 15 साल पुराने वाहनों को हटाने की प्रक्रिया में और करीब डेढ़ हजार टैक्सी सड़क से हट जाएंगी। एक समय जब टैक्सी चालक मालिक को किराया और ईंधन खर्च निकालने के बाद दिन के 500-600 रुपये कमा लेते थे, वहीं अब मेट्रो और ऐप कैब्स की वजह से यह आय भी मुश्किल हो गई है। ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस से संबद्ध वेस्ट बंगाल टैक्सी ऑपरेटर्स को-ऑर्डिनेशन कमेटी के संयोजक नवल किशोर श्रीवास्तव ने कहा कि हर ओर मेट्रो चलने से टैक्सियों के यात्री बहुत घट गए हैं। हम सरकार से अपील करेंगे कि टैक्सी चालकों और उनके परिवारों को बचाने के लिए वैकल्पिक रोजगार की व्यवस्था की जाए।