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गया की तरह क्या होगा बदलाव? पुजारी, सेवायत और दलालों में मचा हड़कंप
कोलकाता। बिहार सरकार ने गया में ऑनलाइन पिंडदान की व्यवस्था शुरू कर दी है। इस फैसले से वहां के पंडों का विरोध तेज़ हो गया है। अब कोलकाता के कालीघाट मंदिर में भी यही सवाल उठ रहा है कि क्या यहां भी ऑनलाइन पूजा की सुविधा शुरू हो सकती है? अगर ऐसा हुआ तो दशकों से चले आ रहे पांडा-राज पर सीधी चोट होगी। कालीघाट मंदिर महानगर कोलकाता का एकमात्र शक्ति पीठ है। यहां हर दिन हजारों श्रद्धालु पूजा के लिए आते हैं। लेकिन मंदिर के पास पहुंचते ही श्रद्धालुओं को सबसे पहले पंडों और दलालों का सामना करना पड़ता है। मंदिर के आसपास 500 से 600 दलाल सक्रिय रहते हैं। उनका काम है श्रद्धालुओं को जबरन पकड़कर डाला (जहां पंडे बैठते हैं) तक ले जाना। मंदिर क्षेत्र में 150 से ज्यादा डाला-दुकानें हैं, जिनमें औसतन तीन-तीन पुजारी रहते हैं। यानी रोज़ाना करीब 450 से 500 पांडा मंदिर प्रांगण में सक्रिय रहते हैं। श्रद्धालु जब मंदिर में प्रवेश करते हैं, तो पंडे और दलाल मधुमक्खियों के झुंड की तरह उन्हें घेर लेते हैं और अपने-अपने डाला में ले जाने की होड़ मच जाती है। यह स्थिति मंदिर प्रशासन और पुलिस के लिए भी चुनौती बनी हुई है। गया की तरह अगर कालीघाट में भी ऑनलाइन पूजा शुरू हुई, तो सबसे बड़ा झटका पंडों और दलालों को लगेगा। इसीलिए वे खुलकर इसका विरोध कर रहे हैं। सेवायतों का तर्क हैं कि मां काली के प्रत्यक्ष दर्शन और पूजा से ही पुण्य मिलता है। ऑनलाइन पूजा से वह पुण्य संभव नहीं। वही पांडा पक्ष का कहना हैं कि हमारा कोई तय वेतन नहीं है। श्रद्धालुओं से मिली दक्षिणा ही हमारी रोज़ी-रोटी है। अगर ऑनलाइन पूजा शुरू हुई तो हमारे परिवार भूखे मर जाएंगे। वही दलालों का कहना हैं कि हमारी कमाई इस पर निर्भर है कि कितने श्रद्धालुओं को डाला तक लाते हैं। अगर ऑनलाइन पूजा शुरू हो गई तो हमारी रोज़ी-रोटी खत्म हो जाएगी।
कालीघाट टेम्पल कमिटी के अध्यक्ष और राज्यसभा के पूर्व सांसद शुभाशीष चक्रवर्ती का कहना हैं कि अगर कोई निजी तौर पर अनुरोध करता है तो हम पूजा का इंतज़ाम करवा सकते हैं। लेकिन फिलहाल मंदिर में ऑनलाइन पूजा की कोई व्यवस्था नहीं है। मंदिर सूत्रों ने बताया कि अदालत के आदेश के मुताबिक मंदिर का रखरखाव टेम्पल कमिटी करती है, लेकिन पूजा की पूरी प्रक्रिया केवल सेवायतों के हाथ में है। ऐसे में ऑनलाइन पूजा शुरू करने के लिए कानूनी बाधाओं को पहले दूर करना होगा। फिलहाल कालीघाट मंदिर के पंडों के दो संगठन हैं जिनमें साथी ब्राह्मण संगठन और कालीघाट कालीमंदिर ब्राह्मण एवं सहयोगी संगठन शामिल हैं। दोनों संगठनों का नियंत्रण इस समय कालीघाट क्षेत्र के एक प्रभावशाली तृणमूल नेता के हाथ में बताया जाता है। यही वजह है कि पंडे और दलाल इस मुद्दे पर खुलकर बोलने से कतरा रहे हैं।
स्थानीय लोगों का मानना है कि कालीघाट मंदिर में गया जैसी ऑनलाइन व्यवस्था लागू होने की संभावना बेहद कम है। कानूनी अड़चनें, पंडों और सेवायतों का विरोध और दलालों की रोज़ी-रोटी का संकट इन सब कारणों से मंदिर प्रशासन भी इस दिशा में आगे बढऩे से बच रहा है।